Sunday, September 1, 2024

 

श्री गिरिराज अग्रवाल की स्मृति

मंगलमूर्त्ति

 

कहानी बहुत पुरानी है – कोई ७०-७५ साल पुरानी. आरा से मेरे परिवार का पुराना संबंध रहा. मेरे पिता का  तो बचपन ही वहां बीता था; वहीँ उनकी पढ़ाई हुई, और कुछ दिन वे वहाँ शिक्षक भी रहे, उसी स्कूल में जो अब जैन स्कूल है. लेकिन यह तो लगभग सवा सौ साल पहले १९०५-१५ के आस-पास की बात है.

आरा अंग्रेजों के ज़माने में पुराने शाहाबाद जिले का मुख्यालय था, जो  भारतीय स्वाधीनता संग्राम में बाबू कुंवर सिंह की वीरता के आख्यानों से जुड़ा है – उस आरा से मैं और मेरे बड़े भाई श्री आनंद्मूर्त्ति भी जुडे रहे (अब स्वर्गीय) जिनकी कॉलेज की पढ़ाई कुछ दिनों तक वहां हरप्रसाद दास जैन कॉलेज में हुई. एम. ए. करने के तुरत बाद मैंने स्वयं उसी कॉलेज में कुछ दिन पढाया था. मेरे बड़े भाई ने अपनी आई.ए. की पढाई उस कॉलेज में की, जहाँ वे हॉस्टल में रहते थे. उनके दो दिली दोस्त वहां थे जो दोनों आरा के महाजन टोली नं. १ में रहते थे – एक थे गौरीशंकर सिन्हा और दूसरे – गिरिराज अग्रवाल.गौरीशंकर सिन्हा बाद में पटना यूनिवर्सिटी में श्रम और समाज कल्याण विभाग में प्रोफ़ेसर हुए (सिगरेट वाली तस्वीर में वे मेरे बड़े भाई के साथ हैं. यह उन्हीं दिनों की तस्वीर है.)

 मेरे बड़े भाई और उनसे भी अधिक गौरी भाई के मौज-मस्ती-मसखरी और दिलबस्तगी के हरवक्त के सामान थे सीधे-सादे गिरिराज भाई. कॉलेज में और कॉलेज के बाद भी इन तीनों की तिकड़ी हमेशा एक साथ ही देखि जाती थी. गिरिराज भाई के घर में खान-पान और पकवान की आफियत रहने के कारण इन तीनों का ज़्यादातर समय वहीँ बीतता था. पढने में मेरे भाई आनंद्मूर्त्ति जी की कॉलेज के प्रोफेसरों में भी बड़ी धाक थी. गौरी भाई पढने में जितने अच्छे थे उससे ज्यादा हंसी-दिल्लगी-मज़ाकपसंदगी में माहिर थे. और ये दोनों कॉलेज में और कॉलेज के बाद के समय में भी गिरिराज भाई का मनोरंजन करते रहते थे. मैं भी उन दिनों कभी-कभी उस मंडली में उपस्थित रहता था, हालांकि मेरी रूचि ज्यादा वहां के खान-पकवान में ही रहती थी. हंसी-ठहाके उस ज़माने की ख़ास पहचान थे, और तीनों दिल खोल कर जोर-जोर से हँसते थे, भले ही मज़ाक किसी का – और ज़्यादातर तो गिरिराज भाई का ही बनता रहता था. अपना मज़ाक बनाने पर भी गिरिराज भाई को मैंने उतने ही जोर के ठहाके लगाते सुना था. मेरे बड़े भाई अंग्रेजी में बहुत पारंगत माने जाते थे. गिरिराज भाई उनसे हमेशा अंग्रेजी के नए-नए शब्द सीखना चाहते थे. इसी प्रसंग में मेरे सामने का एक थोडा अश्लील मजाक मुझे याद आता है (जबकि मैं उम्र में उनलोगों से बहुत छोटा था). एक नारी जननांग के अंग्रेजी नाम को मेरे दोनों मसखरी-पसंद भाइयों ने चुपचाप आपस में राय करके गिरिराज भाई तो अंग्रेजी की प्रसिद्द लेखिका वर्जिनिया वूल्फ की चाची का नाम कह कर सिखा दिया, और जब कॉलेज टुटोरिअल में उन्होंने वही बात बड़े शौक से प्रोफ़ेसर के सामने कही तो सारे क्लास में ठहाकों की लहर देर तक प्रवाहित होती रही और कॉलेज में यह मज़ाक बहुत दिनों तक चलता रहा. ऐसे-ऐसे मसखरी के न जाने कितने प्रसंग रोज़-ब-रोज़ होते रहते थे, लेकिन यह लतीफा बहुत दिनों तक चलता रहा, और उसे मैं उनलोगों की (जो तीनों अब स्वर्गवासी हैं) स्मृति में याद करता हूँ. अश्लीलता भी जीवन का एक अभिन्न अंग है, जिसका उपयोग अक्सर जीवन-हास्य में होता है. अंग्रेजी-पंजाबी के प्रसिद्द लेखक खुशवंत सिंह इसके एक प्रतिमान ही हैं. उन्होंने अश्लीलता को साहित्य के रंग में ऐसा रंग डाला है, जो आनंददायक साहित्य में ढल जाता है.

बहुत बाद में गिरिराज भाई तो आरा में उसी जैन स्कूल के प्रधानाध्यापक हो गए थे और दशकों तक उन्होंने अनेक सुयोग्य विद्यार्थी बनाए जो आज उनको याद करके भावुक हो जाते हैं. मैं भी, जब वे प्रधानाध्यापक हो गए थे, और उन्होंने आरा में ही हरिजी के हाता में अपना नया मकान बनवा लिया था तब अपने बड़े भाई के साथ मैं उनके नए मकान के गृह-प्रवेश में आरा गया था समय तो. बहुत बीत चुका था, लेकिन मेरे बड़े भाई और गिरिराज भाई के दोस्ताने में ज़रा भी अंतर नहीं पड़ा था. वही खान-पकवान और वही ज़ोरदार ठहाके!

अब न वैसे दोस्ताने हैं, न वैसा खान-पकवान और न ही वैसे कान-फाडू ठहाके!              

 

चित्र/आलेख (C) मंगलमूर्त्ति

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