बीत गए वे दिन !
मेरा यह ब्लॉग बिलकुल निजी है | केवल मेरे परिवार, परिजन और बहुत निजी मित्रों के लिए | इस वृत्त से बाहर के लोगों को इसमें रूचि भी नहीं हो सकेगी | इसे एक जैसे-तैसे समेटी गयी पुरानी घरेलू बातों और मेरे ऐसे जीवनानुभवों की गठरी समझा जा सकता है जो मैं आगे की पीढ़ियों के लिए बाँध कर छोड़ जाना चाहता हूँ, जिसे जो जब चाहे पढ़- जान सकता है | और इसी बहाने मैं बहुत सी पुरानी बातों को यहाँ साझा करना चाहता हूँ, जो घर के लोगों के लिए मेरे जीवन-सन्देश की तरह पढ़ी जा सकती हैं |
मेरा पिछला पोस्ट ‘राम सहर की रामकहानी’ इसी की ओर संकेत करता है | इन्टरनेट की टेक्नोलॉजी से ऐसा संभव हुआ है कि आप अपनी बात आगे के बहुत दिनों के लिए सुरक्षित रख सकते हैं | इस पोस्ट में सबसे पहले अपने बड़े भाई आनंदमूर्त्ति से जुडी कुछ बात करूंगा और उनके जीवन से सम्बद्ध कुछ तस्वीरें यहाँ पहली बार लगाऊंगा जो सब मेरी खींची हुई हैं |
मेरे पिता तीन भाई जीवित रहे, यद्यपि मझले चाचा रामपूजन लाल मेरे जन्म से बहुत पहले १९३० में ही मर चुके थे | उनके एक ही लड़का थे – लल्लन भैया जो हम सब में सबसे बड़े थे | छोटे चाचा (देवनंदन लाल) के भी दो लड़के थे – मदन भैया (राजीव रंजन) और लाला भैया (मनोरंजन) और हम दो भाई थे – आनंदमूर्त्ति और मंगलमूर्ति | छोटे चाचा को तीन बेटियाँ भी थीं, जो एक (सरस्वती) मेरे बचपन में गाँव में हैजे की बीमारी में मर गयी थी | दो और – बबुनी दीदी और सुदामा दीदी की शादी क्रमशः कंडसर और डूमराँव में हुई थी | दोनों अब पति-पत्नी नहीं हैं – उनके बच्चे हैं | हमारी अपनी दो बहनें –सरोजिनी (पति, वीरेंद्र नारायण) और विनोदिनी (पति, सुधान्शुकांत रंजन, शिवाजी) – सब अब दिवंगत हो चुके हैं | हमारे और दोनों दीदियों के बच्चे पटना और दिल्ली में हैं | और उसी पीढ़ी के लिए तो मैं यह सब लिख रहा हूँ | उनमें से बहुतों को ये चीज बेकार भी लग सकती है, पर ऐसा प्रयास शायद ही कोई और कर रहा हो |
मुझे याद है मैंने १९४९ में अपना सबसे पहला कोडक ‘बेबी ब्राउनी’ कैमरा पटना स्टेशन के पास एक पुराने स्टूडियो की दूकान से खरीदा था | भैया और चंदा भाभी की तस्वीर उसी से खींची थी | उसके बाद मैंने दो-तीन बॉक्स कैमरा खरीदा और जब १९५२ में कॉलेज में पहुंचा उसके बाद अग्फा आइसोलेट कैमरा खरीदा | फिर तो मेरा फोटोग्राफी का नशा परवान चढ़ गया और मैं पटना के मशहूर त्रिवेदी स्टूडियो के संचालक जयंती त्रिवेदी का शिष्य बन गया और डार्क रूम का सारा काम सीख लिया | घर में अपना एक छोटा-सा डार्क रूम बना लिया | नशा इतना बढ़ा कि मेरे पिता मेरे खर्चे से परीशान हो गए | फोटोग्राफी का दूसरा दौर फिर तब चला जब मैं मुंगेर कॉलेज में पढ़ाने लगा | वहां डा.. बी.जी. बोस के साथ फोटोग्राफी का यह शौक इतना बढ़ा कि मैंने एक मिनोल्टा कैमरा खरीद लिया और वहां की फोटोग्राफी सोसाइटी का ५ साल प्रेसिडेंट रहा | लेकिन वह तो एक अलग लम्बी कहानी है | मोटा-मोटी उस कहानी के दो हिस्से हैं – एक, जब ८या १२ फोटो वाली बड़ी फिल्मों पर फोटो खींचे जाते थे, और १९६० के बाद ३५ मिमि फिल्म कैमरे पर फोटो लिए जाते थे | अभी पहली खेप में पहले दौर के चित्र लगे हैं, जो भैया से सम्बद्ध हैं | ये सभी चित्र १९४९ से १९६०-६५ के बीच के हैं | चंदा भाभी के देहांत (१५/४/५३) के बाद भैया की दूसरी शादी चंदा भाभी की ममेरी बहन विमला भाभी से १०/५/५४ को बनारस में हुई | भैया की पढाई १९४५-४६ से १९५८ तक चली जिसमें बीमारी और असफलता उसमें बाधक बनती रही | इन तस्वीरों में उन्हीं दिनों की तस्वीरें है | ज़्यादातर तस्वीरें तो उनकी हैं जिनका परिचय बताना ज़रूरी नहीं, पर कुछ तस्वीरों का परिचय लिख दिया गया है | यह पहली खेप है | शेष तस्वीरें दूसरी खेप में लगाईं जाएँगी |ये सभी तस्वीरें बॉक्स कैमरा से मैंने ५० और ६० के दशक में खींची थीं जब मैं पटना आ गया था और स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई में लगा था लेकिन फोटोग्राफी का बेहद शौक था | उन दिनों की बातें बाबूजी की डायरी में पढ़ता हूँ तो सब याद आने लगता है | पहले मैं चंदा भाभी, विमला भाभी और तारा भाभी की बातें लिख चुका हूँ | तीनों बहनें भी थीं | तारा भाभी सबसे बड़ी थीं जिनकी शादी लाला भैया से हुई थी | मैं तीनों बरातों में शाहबाला बन कर गया था | तारा और चंदा तो सगी बहनें थीं, विमला उनकी ममेरी बहन थीं, जिनसे भैया की दूसरी शादी चंदा भाभी के मरने के बाद हुई | पहली दोनों बरातें तो चिलकहर गयी थीं, जो बलिया के पास है | दोनों बार बरात का जनवासा एक शामियाने में , जैसा उन दिनों गाँव की बरातों में अक्सर होता था, गाँव में एक स्कूल के पास बगीचे में ठहरीं थीं | बाबूजी ने अपने हाथों से लिट्टी और तस्मई (खीर) बनाई थी, वैसा स्वादिष्ट भोजन मुझको आज भी याद है | बरात का सारा रसद बैलगाड़ी में हमलोगों के साथ गया था | बैलगाड़ी भी नाव से गंगा पार हुई थी |यहाँ पहली खेप में मैंने भैया से सम्बद्ध तस्वीरें ही लगाईं हैं | आगे और ऐसी पारिवारिक तस्वीरें लगाऊँगा और कुछ उनकी कहानी भी लिखूंगा | भैया की कहानी बनारस से शुरू होती है जहाँ उनका जन्म १ अप्रैल, १९२९ को बुलानाला वाले मकान में हुआ था | वहीं दोनों बहनों - सरोज और बिदु दीदी का जन्म भी हुआ था |मौसी बताती थी की वहीँ एक बार माँ बिंदु दीदी को छत की फर्श पर लिटा कर काम कर रही थी, तभी एक बन्दर आकर बच्ची को उठाकर मुंडेरे पर जा बैठा | हाय-तोबा के बाद केला के लालच पर पर बच्ची को नीचे लाया | भैया को वहीँ शीतला माता हुई थीं जिससे उनके पूरे चेहरे पर गहरे दाग आ गए थे |
मुझे याद है भैया शुरू से ही खिलौनों और किताबों के बहुत शौक़ीन थे | बाबूजी उनके लिए पटना से सिनमा दिखाने वाली छोटी-सी मशीन लाये थे और भैया ने बड़े उत्साह से सबको फिल्म दिखाई थी | वे मुझको सबसे ज्यादा प्यार करते थे | माँ के नहीं होने से दोनों दीदियाँ और घर के सभी लोग मुझको सबसे ज्यादा प्यार करते थे | छपरा में बीते बचपन के उन दिनों के बारे में मैनें अपने अन्य संस्मरणों में भी लिखा है | भैया को शुरू से अंग्रेजी किताबें खरीदने का शौक था | वे हमेशा उन्हें ही पढ़ते रहते थे | उनकी अंग्रेजी और हिंदी की लिखावट बाबूजी की
भैया और चंदा भाभी (१९४८)
लिखावट से भी ज्यादा सुन्दर थी | बाबूजी उनकी किताब खरीदने की आदत से परीशान रहते थे | भैया अक्सर मुझको साथ लेकर छपरा स्टेशन के बुक स्टाल पर किताबें खरीदने जाते थे और प्लेटफार्म पर चक्कर लगाते हुए मुझको उनकी कहानियाँ सुनाया करते थे | बाबूजी के साहित्य-स्वाध्याय और भैया के अंग्रेजी-साहित्य प्रेम ने ही मुझको भी दोनों भाषाओं के साहित्य की ओर आकर्षित किया |
हमलोग बाबूजी का साथ कॉलेज की लम्बी छुट्टियों में गाँव जाया करते थे | उसी घर की तस्वीर मैंने यहाँ लगाईं है |
भैया और चंदा भाभी (१९५१) की यह अकेली तस्वीर मेरी खींची हुई है जिसे मैंने बेबी ब्राउनी कमरे से लिया था | मैं तब दस साल का था | चंदा भाभी मुझको अपने बेटे की तरह प्यार करती थीं और गोद में लेकर सोती थी | वे मुझको अपने और भैया के जीवन के बारे में भी बहुत-सी बातें प्रेम से समझाती थीं | उनकी अंतिम बीमारी ( मेनेनजाइटिस ) में मैं उनको पालकी में लिटा कर गाँव से बक्सर ले गया था जहाँ ५ दिन वे गंभीर रूप से बीमार रहकर मरीं | उस समय वहीँ रहकर रातदिन-मैंने उनकी सेवा की थी | उनका मरना, मेरी माँ के मरने की ही तरह हमारे परिवार के लिए बहुत घातक सिद्ध हुआ | भैया तो उनके मरने के बाद विक्षिप्त से हो गए थे |
भैया की कहानी में उनवांस की कहानी भी गहराई से जुडी है | शायद यह उनके जीवन का सबसे सुखावह समय था| तब वे जैन कॉलेज (आरा) में दाखिल ही हुए थे | शादी से पहले भी वे उनवांस वाली घर की पछिमारी लम्बी कोठारी वाले पुस्तकालय में सुबह से शाम तक बंद रह कर पढ़ा करते थे जहाँ उनकी अलग एक अंग्रेजी किताबों की आलमारी थी | उनकी दुनिया जैसे उसी आलमारी में बंद रहती थी | सुबह हमसब लोग सैर और नित्य-कर्म के लिए गाँव से उत्तर वाले पोखरे या कभी गाँव के पूरब वाली कोचान नदी की ओर जाया करते थे | इसमें अक्सर शिवाजी, प्रकाश, गौरी भाई आदि शामिल रहते ,जब ये लोग गाँव आये होते | फिर चंदा भाभी भी आ गयी थीं और सरोज और बिंदु दीदी तथा दोनों जीजा -वीरेनजी और शिवाजी या उनके परिवार के लोग भी आते ही रहते थे | बाबूजी भी उस समय वहीँ होते | बाहर दालान भी बाबूजी के रहने से गाँव के लोगों से भरा रहता | हमारे टोले के सभी छोटे-बड़े, सभी जाति के लोगों













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