Monday, May 3, 2021

 

बीत गए वे दिन !

मेरा यह ब्लॉग बिलकुल निजी है | केवल मेरे परिवार, परिजन और बहुत निजी मित्रों के लिए | इस वृत्त से बाहर के लोगों को इसमें रूचि भी नहीं हो सकेगी | इसे एक जैसे-तैसे समेटी गयी पुरानी घरेलू बातों और मेरे ऐसे जीवनानुभवों की गठरी समझा जा सकता है जो मैं आगे की पीढ़ियों के लिए बाँध कर छोड़ जाना चाहता हूँ, जिसे जो जब चाहे पढ़- जान सकता है | और इसी बहाने मैं बहुत सी पुरानी बातों को यहाँ साझा करना चाहता हूँ, जो घर के लोगों के लिए मेरे जीवन-सन्देश की तरह पढ़ी जा सकती हैं |

मेरा पिछला पोस्ट ‘राम सहर की रामकहानी’ इसी की ओर संकेत करता है | इन्टरनेट की टेक्नोलॉजी से ऐसा संभव हुआ है कि आप अपनी बात आगे के बहुत दिनों के लिए सुरक्षित रख सकते हैं | इस पोस्ट में सबसे पहले अपने बड़े भाई आनंदमूर्त्ति से जुडी कुछ बात करूंगा और उनके जीवन से सम्बद्ध कुछ तस्वीरें यहाँ पहली बार लगाऊंगा जो सब मेरी खींची हुई हैं |

मेरे पिता तीन भाई जीवित रहे, यद्यपि मझले चाचा रामपूजन लाल मेरे जन्म से बहुत पहले १९३० में ही मर चुके थे | उनके एक ही लड़का थे – लल्लन भैया जो हम सब में सबसे बड़े थे | छोटे चाचा (देवनंदन लाल) के भी दो लड़के थे – मदन भैया (राजीव रंजन) और लाला भैया (मनोरंजन) और हम दो भाई थे – आनंदमूर्त्ति और मंगलमूर्ति | छोटे चाचा को तीन बेटियाँ भी थीं, जो एक (सरस्वती) मेरे बचपन में गाँव में हैजे की बीमारी में मर गयी थी | दो और – बबुनी दीदी और सुदामा दीदी की शादी क्रमशः कंडसर और डूमराँव में हुई थी | दोनों अब पति-पत्नी नहीं हैं – उनके बच्चे हैं | हमारी अपनी दो बहनें –सरोजिनी (पति, वीरेंद्र नारायण) और विनोदिनी (पति, सुधान्शुकांत रंजन, शिवाजी) – सब अब दिवंगत हो चुके हैं | हमारे और दोनों दीदियों के बच्चे पटना और दिल्ली में हैं | और उसी पीढ़ी के लिए तो मैं यह सब लिख रहा हूँ | उनमें से बहुतों को ये चीज बेकार भी लग सकती है, पर ऐसा प्रयास शायद ही कोई और कर रहा हो |

मुझे याद है मैंने १९४९ में अपना सबसे पहला कोडक ‘बेबी ब्राउनी’ कैमरा पटना स्टेशन के पास एक पुराने स्टूडियो की दूकान से खरीदा था | भैया और चंदा भाभी की तस्वीर उसी से खींची थी | उसके बाद मैंने दो-तीन बॉक्स कैमरा खरीदा और जब १९५२ में कॉलेज में पहुंचा उसके बाद अग्फा आइसोलेट कैमरा खरीदा | फिर तो मेरा फोटोग्राफी का नशा परवान चढ़ गया और मैं पटना के मशहूर त्रिवेदी स्टूडियो के संचालक जयंती त्रिवेदी का शिष्य बन गया और डार्क रूम का सारा काम सीख लिया | घर में अपना एक छोटा-सा डार्क रूम बना लिया | नशा इतना बढ़ा  कि मेरे पिता मेरे खर्चे से परीशान हो गए | फोटोग्राफी का दूसरा दौर फिर तब चला जब मैं मुंगेर कॉलेज में पढ़ाने लगा | वहां डा.. बी.जी. बोस के साथ फोटोग्राफी का यह शौक इतना बढ़ा  कि मैंने एक मिनोल्टा कैमरा  खरीद लिया और वहां की फोटोग्राफी सोसाइटी का ५ साल  प्रेसिडेंट रहा | लेकिन वह तो एक अलग लम्बी कहानी है | मोटा-मोटी  उस कहानी के दो हिस्से हैं – एक, जब ८या १२ फोटो वाली बड़ी फिल्मों पर फोटो खींचे जाते थे, और १९६० के बाद ३५ मिमि फिल्म कैमरे पर फोटो लिए जाते थे  | अभी पहली खेप में पहले दौर के चित्र लगे हैं, जो भैया से सम्बद्ध हैं | ये सभी चित्र १९४९ से १९६०-६५ के बीच के हैं | चंदा भाभी के देहांत (१५/४/५३) के बाद भैया की दूसरी शादी चंदा भाभी की ममेरी बहन विमला भाभी से १०/५/५४ को बनारस में हुई | भैया की पढाई १९४५-४६ से १९५८ तक चली जिसमें बीमारी और असफलता उसमें बाधक बनती रही | इन तस्वीरों में उन्हीं दिनों की तस्वीरें है | ज़्यादातर तस्वीरें तो उनकी हैं जिनका परिचय बताना ज़रूरी नहीं, पर कुछ तस्वीरों का परिचय लिख दिया गया है | यह पहली खेप है | शेष तस्वीरें दूसरी खेप में लगाईं जाएँगी |

ये सभी तस्वीरें बॉक्स कैमरा से मैंने ५० और ६० के दशक में खींची थीं जब मैं पटना आ गया था और स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई में लगा था लेकिन फोटोग्राफी का बेहद शौक था | उन दिनों की बातें बाबूजी की डायरी में पढ़ता हूँ तो सब याद आने लगता है | पहले मैं चंदा भाभी, विमला भाभी और तारा भाभी की बातें लिख चुका हूँ | तीनों बहनें भी थीं | तारा भाभी सबसे बड़ी थीं जिनकी शादी लाला भैया से हुई थी | मैं तीनों बरातों में शाहबाला बन कर गया था | तारा और चंदा तो सगी बहनें थीं, विमला उनकी ममेरी बहन थीं, जिनसे भैया की दूसरी शादी चंदा भाभी के मरने के बाद हुई | पहली दोनों बरातें तो चिलकहर गयी थीं, जो बलिया के पास है | दोनों बार बरात का जनवासा एक शामियाने में , जैसा  उन दिनों गाँव की बरातों में अक्सर होता था,  गाँव में एक स्कूल के पास  बगीचे में ठहरीं थीं | बाबूजी ने अपने हाथों से लिट्टी और तस्मई (खीर) बनाई थी, वैसा स्वादिष्ट भोजन मुझको आज भी याद है | बरात का सारा रसद बैलगाड़ी में हमलोगों के साथ गया था | बैलगाड़ी भी नाव से गंगा  पार हुई थी |

यहाँ पहली खेप में मैंने भैया से सम्बद्ध तस्वीरें ही लगाईं हैं | आगे और ऐसी पारिवारिक तस्वीरें लगाऊँगा और कुछ उनकी कहानी भी लिखूंगा | भैया की कहानी बनारस से शुरू होती है जहाँ उनका जन्म १ अप्रैल, १९२९ को बुलानाला वाले मकान  में हुआ था | वहीं दोनों बहनों - सरोज और बिदु दीदी का जन्म भी हुआ था |मौसी बताती थी की वहीँ एक बार माँ बिंदु दीदी को छत की फर्श पर  लिटा कर काम कर रही थी, तभी एक बन्दर आकर बच्ची को उठाकर मुंडेरे पर जा बैठा | हाय-तोबा के बाद केला के लालच पर  पर बच्ची को नीचे लाया | भैया को वहीँ शीतला माता हुई थीं जिससे उनके पूरे चेहरे पर गहरे दाग आ गए थे |

मुझे याद है भैया शुरू से ही खिलौनों और किताबों के बहुत शौक़ीन थे | बाबूजी उनके लिए पटना से सिनमा दिखाने वाली छोटी-सी मशीन लाये थे और भैया ने बड़े उत्साह  से सबको फिल्म दिखाई थी | वे मुझको सबसे ज्यादा प्यार करते थे | माँ के नहीं होने से दोनों दीदियाँ और घर के सभी लोग मुझको सबसे ज्यादा प्यार करते थे | छपरा में बीते  बचपन के उन दिनों के बारे में मैनें अपने अन्य संस्मरणों में भी लिखा है | भैया को शुरू से अंग्रेजी किताबें खरीदने का शौक था | वे हमेशा उन्हें ही पढ़ते रहते थे | उनकी अंग्रेजी और हिंदी की लिखावट बाबूजी की

भैया और चंदा भाभी (१९४८)

 लिखावट से भी ज्यादा सुन्दर थी |  बाबूजी उनकी किताब खरीदने की आदत से परीशान रहते थे | भैया अक्सर मुझको साथ लेकर छपरा स्टेशन के बुक स्टाल पर  किताबें खरीदने जाते थे और प्लेटफार्म पर चक्कर लगाते हुए मुझको उनकी कहानियाँ सुनाया करते थे | बाबूजी के साहित्य-स्वाध्याय और भैया के अंग्रेजी-साहित्य प्रेम ने ही मुझको भी दोनों भाषाओं  के साहित्य की ओर आकर्षित किया |

हमलोग बाबूजी का साथ कॉलेज की लम्बी छुट्टियों में गाँव जाया करते थे | उसी घर की तस्वीर मैंने यहाँ लगाईं है |   



भैया और चंदा भाभी (१९५१) की यह अकेली तस्वीर मेरी खींची हुई है जिसे मैंने बेबी ब्राउनी कमरे से लिया था | मैं तब दस साल का था | चंदा भाभी मुझको अपने बेटे की तरह प्यार करती थीं और गोद में लेकर सोती थी | वे मुझको अपने और भैया के जीवन के बारे में भी बहुत-सी बातें प्रेम से समझाती थीं | उनकी अंतिम बीमारी ( मेनेनजाइटिस ) में मैं उनको पालकी में लिटा कर गाँव से बक्सर ले गया था जहाँ ५ दिन वे गंभीर रूप से बीमार रहकर मरीं | उस समय वहीँ रहकर रातदिन-मैंने उनकी सेवा की थी | उनका मरना, मेरी माँ के मरने की ही तरह हमारे परिवार के लिए बहुत घातक सिद्ध हुआ | भैया तो उनके मरने के बाद विक्षिप्त से हो गए थे |

तारा भाभी हमारे बड़े चचेरे भाई लाला भैया से पहले ब्याह कर आई थीं | उन्होंने फिर साल-भर बाद अपनी ममेरी बहन विमला से आनंद भैया की शादी कराई |उसी परिवार की होने के कारण विमला भाभी ने आते ही परिवार में सब कुछ संभाल लिया | यह १९५४ की बात है जब हमलोग बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन, कदम कुआं में पिछवाड़े के एक फ्लैट में रहते थे | बाबूजी की डायरी में उन दिनों की पूरी कहानी लिखी मिलती है | मैं तब बी.ए. आनर्स (इंग्लिश) में पढ़ रहा था | उस वक़्त तक फोटोग्राफी का मेरा शौक और परवान चढ़ चुका था  जो अब तक बना हुआ है | बाद में रिटायर होने पर जब मैं यमन में प्रोफ़ेसरी करने लगा था तब मैंने एक वीडियो कैमरा भी ख़रीदा था जिससे कई फिल्मे बनाई जिनमें एक पूरी फिल्म अपनी दिवंगता जीवन-संगिनी कुसुम पर भी बनाई जो मेरे लैपटॉप में देखी जा सकती है | उसीमें एक फिल्म अपने यमन के दिनों पर भी है, जो हमेशा के लिए उन स्मृतियों को सुरक्षित करती है |
भैया और विमला भाभी (१९६७)



मैंने अपने संस्मरण किताबों की शकल में भी लिखे हैं | पर यह निजी ब्लॉग घरेलू  बातों  और अनुभवों को लिखने के लिए खास तौर से बनाया है | इसमें परिवार के - ख़ास तौर से गाँव के परिवार के लोगों की तस्वीरें भी आगे चलकर लगेंगी ताकि लोग परिवार के उन लोगों को देख सकें जिन्हें उन्होंने कभी नहीं देखा है | जैसे मेरे मामा-मामी, लल्लन भैया-भाभी ( दो विवाह की) लाला भैया, मदन भैया,  दोनों चाचा (जिनमें मझले मेरे जन्म से पहले मर चुके   थे ) परिवार की और बहनें, चाची, बुआ वगैरह | गाँव के बहुत से लोगों - जैसे हरवंश भैया, मुक्तेश्वर पाण्डेय, सुदामा पाण्डेय, राजनाथ दुबे (जिनका जन्म बाबूजी के जन्म-दिन को ही हुआ था ), पं. जगन्नाथ शर्मा,आदि - की तस्वीरें भी यहाँ आगे चलकर देखी जा सकेंगी - जो सब बाबूजी की 'देहाती दुनिया' (राम सहर) के ही लोग लगते थे  |

भैया के जीवन को मैंने बहुत निकट से देखा | बचपन की शीतला का उनपर गहरा असर हुआ था | वे मानसिक रूप से अत्यंत कोमल थे | बक्सर में जब चंदा भाभी का देहांत हुआ था और रात में जब उनका शव अभी कमरे में ही पड़ा था और मैं तथा उनके मित्र (अब दिवंगत) गौरी शंकर सिन्हा (आरा के जो उनके सबसे गहरे मित्र थे, और पटना विवि में समाज शास्त्र के नामी प्रोफ़ेसर थे) आँगन में उनको संभालने की कोशिश कर रहे थे तो शोक में पागल वे फिल्म का गीत - अये मेरे दिल कहीं और चल - गाने लगे थे | हम सब लोग रात-भर रोते रहे थे | बाद में मैंने सुना वे कभी-कभी अकेले वहां श्मशान घाट चले जाते थे | लेकिन दूसरा विवाह होने पर उनके साले प्रकाश (नवजादिक लाल जी के बड़े लड़के) ने उनको बहुत संभाला | यों प्रकाश की भी अपनी बहुत उलझी हुई कहानी रही, और अब तो वे भी बहुत पहले ही दिवंगत ही गए | प्रकाश भी अच्छा लिखते थे और मुझे याद है उनकी एक कहानी 'धर्म युग' में छपी थी | कुछ दिन वे पटना की प्रकाशन-संस्था 'भारती भवन' में काम करते रहे | उनका छोटा भाई जगदीश मेरा हमजोली  था जिसकी तस्वीर भी यहाँ लगेगी | 

भैया को तस्वीरें खिंचवाने का बहुत शौक था और वे मुझको बहुत प्यार करते थे | उनके कारण ही मैंने अंग्रेजी में आनर्स लिया और उनसे मैंने अंग्रेजी भाषा और साहित्य छात्र की तरह पढ़ा | लॉरेंस की एक कहानी 'ओडर ऑफ़ क्रिसैन्थमम्स'  उनसे पढ़ कर मैनें अपने ट्युटोरियल में सबसे अधिक अंक पाए थे | लेकिन भैया के होश में माँ के मरने का उनपर गहरा मनोवैज्ञानिक आघात लगा था जो जीवन भर रहा | वे छपरा में अक्सर टाइफाइड से बीमार हो जाते थे | इसका इनकी पढ़ाई पर बहुत असर पड़ता रहा | गणित में वे ३ बार मैट्रिकुलेशन में फेल हुए | अंग्रेजी के अध्ययन में वे इतने डूबे रहते की और किसी विषय पर उनका ध्यान ही नहीं रहता, जिसके कारण, और कई बार इम्तहान के  पहले बीमार होने के कारण , वे असफल होते रहे और अंततः दो-तीन बार ड्राप करने के बाद किसी तरह १९५८ में तीसरी श्रेणी में एम्.ए, पास हुए | उसके बाद १९५९ में  मीठा पुर, पटना, एक प्राइवेटके कॉलेज मे लेक्चरर बने | फिर १९६४ में मेरे बहुत दबाव डालने पर भागलपुर विवि  से उन्होंने दुबारा एम्.ए. किया और सर्वोच्च स्थान पाया | उसके बाद ए.एन. कॉलेज पटना में उनकी सेवाएँ नियमित हुईं, और वहीँ से रिटायर भी हुए |  मुझे याद  है, तब मैं मुंगेर कॉलेज में पढ़ा रहा था, भागलपुर में एम्.ए. का इन्म्तहान दिलवाने का सारा विधान मैंने पूरा कराया था, और जितने दिन वहां इम्तहान चला मैं उनके साथ वहीँ रहा (प्रो.मणिकांत वर्मा के यहाँ, जो अब यॉर्क विवि, इंग्लॅण्ड में है) , उन्ही के साथ वहां  सोता था, रोज़ उनको लेकर इम्तहान दिलाने जाता था, पूरे समय विभाग में बैठा रहता था, विभाग के लोगों ने भी बहुत साथ दिया. क्योंकि डर रहता था की भैया सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं देंगें और बीच में ही इम्तहान छोड़ देंगे |

इसी तरह जब प्रमोशन का सवाल था और पीएच. डी. करना था तब भी मैं बीच-बीच में मुंगेर से पटना आता, अपने टाइपराइटर पर  उनकी थीसिस टाइप करता, किताबें लाकर देता,और हाथ धोकर उनके पीछे पड़ा रहता | तब जाकर थीसिस सबमिट हुई और डिग्री मिली | बाद में वह छपी भी | उसमें आभार में उन्होंने लिखा - "My thanks are also due to my younger brother Dr B.S.M. Murty(then in the Department of English, R.D.&D.J. College, Monghyr) for having helped me in several ways. He not only procured a considerable amount of relevant material but also offered to be on the alert to see that the technicalities were not bungled".

भैया के साथ अपने आत्मिक संबंधों के विषय में विस्तार से कुछ लिखना मेरे लिए शायद संभव ही नहीं, क्योंकि हमारे उस भ्रात्रि-प्रेम की संश्लिष्टता को व्याख्यायित करना न संभव लगता है और न आवश्यक |                                                    छोटे बहनोई शिवाजी के साथ (१९५४)

उन पर एक स्मारक ग्रन्थ - जिसमें उनका सम्पूर्ण संरक्षकीय लेखन एकत्र हो सके, इसकी हमारी योजना है, जिसे अब आगे की पीढ़ी शायद पूरा करे |

बी.एन.कॉलेज हॉस्टल की छत पर मित्रों के साथ (१९५४) 

भैया की कहानी में उनवांस की कहानी भी गहराई से जुडी है | शायद यह उनके जीवन का सबसे सुखावह समय था| तब वे जैन कॉलेज (आरा) में दाखिल ही हुए थे | शादी से पहले भी वे उनवांस वाली घर की पछिमारी लम्बी कोठारी वाले पुस्तकालय में सुबह से शाम तक बंद रह कर पढ़ा करते थे जहाँ उनकी अलग एक अंग्रेजी किताबों की आलमारी थी | उनकी दुनिया जैसे उसी आलमारी में बंद रहती थी | सुबह हमसब लोग सैर और  नित्य-कर्म के लिए गाँव से उत्तर वाले पोखरे या कभी गाँव के पूरब वाली कोचान नदी की ओर जाया करते थे | इसमें अक्सर शिवाजी, प्रकाश, गौरी भाई आदि शामिल रहते ,जब ये लोग  गाँव आये होते |  फिर चंदा भाभी भी आ गयी थीं और सरोज और बिंदु दीदी तथा दोनों जीजा -वीरेनजी और शिवाजी या उनके परिवार के लोग भी आते ही रहते थे | बाबूजी भी उस समय वहीँ होते |  बाहर दालान भी बाबूजी के रहने से गाँव के लोगों से भरा रहता | हमारे टोले के सभी छोटे-बड़े, सभी जाति के लोगों
                                                                                            बी.ए. की डिग्री प्राप्त करते (१९५५)


 से दालान और पुस्तकालय का कमरा बराबर गुलज़ार रहता | सांध्य में रोज़ रामचरित मानस या महाभारत का पाठ होता और बाबूजी लोगों को अर्थ समझाते | उस समय गाँव के बड़े-बूढ़े ब्राह्मण लोग, ख़ास कर राजनाथ दुबे तरह-तरह का अवांतर प्रसंग उठाते और अपनी व्याख्या देते जिससे 'देहाती दुनिया' के 'रंग में भंग' अध्याय (वितंडा-विवाद-प्रसंग)  का स्मरण हो आता जहाँ 'राम सहर' के 'पञ्च मंदिल' पर शास्त्रीय प्रसंगों का चूरन बांटा जाता | बाबूजी ने लिखा है कि मेरे पितामह वागीश्वरी दयाल और उनसे पहले भी दालान पर शास्त्र-पाठ और अर्थ कहने की यह परंपरा बराबर  चलती रही थी | उस समय के उन दिनों जैसे सुखमय दिन अब कभी नहीं  लौटने वाले | लेकिन मेरे भैया जब यह सब दालान में होता रहता, उस समय भी अपनी धुंवाती लालटेन लेकर घर के आगन में अपना बिस्तर लगा कर पढ़ते रहते थे, सारी दीन-दुनिया से बेखबर |

घर में चंदा भाभी होती, अच्छा खाना होता, दीदियों का सुखी दाम्पत्य-जीवन होता, मझली चाची का हास-परिहास होता, घर आये अतिथियों, सम्बन्धियों का चुहल-मज़ाक होता, बाहर चबूतरे पर रात में सोने के सभी बिस्तर लगे होते जहाँ बाबूजी की गंभीर बातें  होती और राजनाथ दुबे और सिपाही दुबे जो दिन-रात वहीँ बने रहते उनके लटके-झटके भी  होते | वे लोग केवल खाना खाने अपने बगल के घरों में जाते थे, नहीं तो उनका आशियाना बराबर के लिए हमारा दालान ही था | 

अभी अब इस कहानी को यहीं रोक रहा हूँ | भैया की कहानी और विस्तार से कभी और लिखूंगा | अगलों पोस्ट में यह पारिवारिक और गाँव की कहानी - जिसमें अब शहर भी शामिल होगा - आगे बढ़ेगी | नीचे कुछ और तस्वीरें भैया से सम्बद्ध |

नीचे : पीछे- जगदीश, अश्विनी, महेश | आगे - राजेन्द्र, लाला भैया, विनोद,प्रकाश, और भैया|

और नीचे 




More family photos in coming posts.

भैया और गौरी भाई की मौज!

नीचे: राजेन्द्र (विमला भाभी के  भाई)के साथ |




सभी चित्र कॉपी राईट डा. मंगलमूर्त्ति

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bsmmurty@gmai.com 

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