‘रामसहर’ की
रामकहानी
[ मेरे पिता शिवपूजन सहाय ने अपने उपन्यास ‘देहाती दुनिया’
में ‘भोलानाथ’ के बचपन के जिस गाँव ‘रामसहर’ की कहानी लिखी है, वह वास्तव में उनका
अपना जन्म-ग्राम ‘उनवांस’ ही है | ‘रामसहर’ की वह कहानी एक छद्म रूप में उनके अपने
परिवार की ही कहानी है | ‘देहाती दुनिया’ का औपन्यासिक चरित्र ‘भोलानाथ’ जो उस
गाँव ‘रामसहर’ में बीते अपने बचपन की कहानी सुनाता है, छद्म रूप में वह शिवपूजन
सहाय के अपने वंश-वृक्ष का मूल-पूर्वज ‘सुथर दास’ ही है | लेखक ने अपने गाँव में बीते अपने बचपन की
स्मृतियों को ही अपने औपन्यासिक कथानक का आधार बनाया है | इस नए परिप्रेक्ष्य में
ही मैंने ‘देहाती दुनिया’ उपन्यास का नया अनुशीलन अपने उस लेख में किया है जो मेरे ब्लॉग – vibhutimurty.blogspot.com पर और उसका परिशिष्टांश मेरे अन्य ब्लॉग vagishwari.blogspot.com पर पढ़ा जा सकता है | अब उसी श्रृंखला के पारिवारिक पक्ष का विस्तार यहाँ पढ़ा
जा सकता है, जिसमें विशेषतः मेरे परिवार और परिजन की विशेष रूचि होगी, और इसीलिए
इसको एक सीमित निजी नए ब्लॉग पर रखा गया है जिसका सार्वजनिक प्रकाशन अभीष्ट नहीं
है |
यह मेरा नया निजी ब्लॉग विशेषतः उसी दृष्टि से बना है, इसमें
मेरे उस गाँव, मेरे परिवार, उसकी वंश परंपरा, आदि का विवरण होगा, और यहीं (आगे के
किसी पोस्ट में) पारिवारिक और मेरे जीवन और मुझसे जुड़े मित्रों की बहुत सी पुरानी
तस्वीरें भी होंगी | मेरे अपने बीते जीवन से जुडी बहुत सी निजी स्मृतियाँ होंगी
जिसे एक कच्ची आत्मकथा के रूप में पढ़ा जा सकेगा | इसमें बहुत सी ऐसी स्मृतियाँ भी
होंगी जिनका परिप्रेक्ष्य मूलतः पारिवारिक होगा जिसमें स्वाभाविक रूप से मेरे
परिवार के लोगों और यदा-कदा मेरे पिता की उपस्थिति भी कहीं-कहीं झलकेगी |
’राम सहर’ : मेरा
गाँव और मेरा वह पुराना घर
‘राम सहर’ मेरे
बचपन का अपना गाँव भी रहा | अपने पिता का लिखा उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ जब बाद में
मैंने पढ़ा तो मुझको लगा उपन्यास का यह गाँव ‘राम सहर’ तो हमारा अपना ही ‘उनवांस’
गाँव है, जिसके पूरब में बहने वाली ‘कोचान’ नदी में हमलोग रोज़ नहाने जाते
थे – और उस उपन्यास के प्रायः हर चरित्र को भी
हमने अपने बचपन के उस गाँव में ही
हर जगह किसी-न-किसी रूप में इन्हीं आँखों से देखते थे | किस और उपन्यास, उसके
लेखक, और उसके परिवार का ऐसा संयोग कहीं और देखने को मिल सकता है | यह मेरा
सौभाग्य है कि हिंदी साहित्य की एक अन्यतम कथा-कृति में वर्णित भारतीय ग्रामीण
जीवन के पूरे परिवेश और उसके चरित्रों, उनकी बोल-चाल, हास-परिहास, सौहार्द और
जीवनोल्लास के बीच ही मेरे अपने जीवन का
पूर्वार्द्ध बीता – उस कृति, उस भाव-भूमि और उसके कृतिकार के साथ बीतते बचपन में !
इस बीच मेरे
जीवन के सत्तर साल बीत गए | जीवन ही कितना बदल गया | मेरे बचपन का मेरा वह गाँव भी अब बहुत बदल गया है | मेरा पुश्तैनी घर भी अब नहीं रहा | वहां अब मेरे ही परिवार के लोगों के नये
पक्के मकान बन गए | गाँव का पूरा नक्शा ही बदल गया जैसे | अब तो पुराने गाँव और उस
पुश्तैनी घर की बस कुछ तस्वीरें मेरी
स्मृति में रह गई हैं, जिनमें कुछ तस्वीरें मेरे पास बची हैं जिन्हें मैंने अपने
कैमरे से उन दिनों खींचा था |
गाँव के वे
सारे लोग भी अब नहीं रहे | मेरे बचपन के उस
गाँव के बहुत से साथी भी अब नहीं रहे| वहां के ज़्यादातर पुराने घर टूट गए और उनकी जगह
अब शहरनुमा कई पक्के दुमंजिले मकान बन गए | गाँव की काया ही जैसे बदल गई – जहां
शाम घिरते ही मिटटी के बेढब घरों में कुछ
दिये टिमटिमाने लगते थे, या बड़े लोगों के पक्के घरों में लालटेनें जल जाती थीं,
वहां अब पूरे गाँव में बिजली के खम्भे लग
गए, रोशनी की जगमगाहट बढ़ गई, अंधेरी गलियाँ ईंटों से पट कर अब रौशन हो गईं,गाँव
में ही मोबाइल का टावर लग गया |
गाँव से सटे
पच्छिम जो मुख्य कच्ची सड़क थी, जो गाँव को उत्तर की ओर बक्सर और दक्खिन की ओर
दिनारा से जोडती थी, हमारे बचपन में शाम होते-होते सुनसान हो जाती थी | वह अब एक चौड़ी
पिच सड़क में तब्दील हो गई है, और उसके दोनों किनारे अच्छा-ख़ासा बाज़ार बस गया है | लगातार
मोटरें-बसें चलने लगी हैं | लोग-बाग़ भी देर रात तक घरों में नहीं, सडकों पर ही बने
रहते हैं | बीते दिनों में बड़े लोगों के
दालान पर या बड-पीपल के नीचे किसी चबूतरे पर जो चौपाल जमती थी, अब वह सडक वाले
बाज़ार में चाय की दूकानों पर ज़मने लगी है | गाँव के पूरबी ओर जो नदी बहती थी वह तो
वैसी ही है, पर वह अब जैसे बराबर उदास ही
रहती है, और उसके रास्ते में, या गाँव के
बीच में, या इधर- उधर जो कुछ पुराने नीम-मौलिसरी
या बड-पीपल के पेड़ थे, वे सब अब ज़माने का यह बदलना देखते हुए मौन हो गए हैं; या
कभी हवा बहती है या आंधी आती तो उसीसे
अपना मन बहला लेते हैं | किसी जीवन-स्पंदित, हरे-भरे गाँव को एक निष्ठुर नीम-शहर
में बदलते हुए देखना जीवन का यह एक सिहराने वाला अनुभव है |
बक्सर स्टेशन पटना-मुगलसराय
मेन लाइन के बीच में पड़ता है | यहीं ईस्ट इंडिया कंपनी और मुगलों के बीच अंतिम
निर्णायक युद्ध १७६४ में हुआ था जिसमें मुगलों की करारी हार हुई थी | उस युद्ध में
मारे गए अंग्रेजों की एक बड़ी कब्रगाह आज भी उसका साक्षी है | स्टेशन से लगभग १
किमी उत्तर गंगा हैं, जिसके उस पार उत्तर प्रदेश का गाजीपुर जिला पड़ता है | अब
यहाँ शहर से कुछ पूरब हट कर गंगा पर एक रोड-पुल बन गया है, लेकिन मेरे बचपन में
नाव से ही नदी पार करते थे | सुथर दास के समय में भी ऐसा ही रहा होगा | स्टेशन से
उत्तर जाने वाली मुख्य सड़क पर ही दाईं ओर वह कब्रगाह पड़ती है, जो बक्सर युद्ध की
याद दिलाती है | बक्सर का महत्त्व एक हिन्दू तीर्थ का है, जहाँ गंगा का ‘रामरेखा
घाट’ है | वहां घाट पर एक प्राचीन रामेश्वर महादेव का मंदिर भी है |
किम्वदंती है कि बक्सर में ही विश्वमित्र जी का
आश्रम था जहां भगवान राम आये थे | शहर के बीचो-बीच एक ‘ताड़का’ नाला अभी भी है | मेरे
पिता से लगभग सात-आठ पीढ़ी पहले गंगा पार गाजीपुर के पास के एक बड़े गाँव शेरपुर से
उनके पूर्वज सुथरदास अपने माता-पिता के साथ लगभग बक्सर-युद्ध के आस-पास ही (१८वीं
सदी उत्तरार्द्ध में ) उनवांस में आकर अपनी ननिहाल में बस गए थे, क्योंकि उनके नाना को बस एक लड़की
(उनकी माँ) ही थी, और घर की खेती-बारी अंततः सुथर दास को ही संभालनी थी, क्योंकि
उनके पिता भी शेरपुर से उनवांस आने के बाद चल बसे थे | लगभग यही कहानी मेरे पिता
ने अपने आत्मकथात्मक उपन्यास के रूप में ‘देहाती दुनिया’ में लिखी है, जैसा मैं
ऊपर लिख चुका हूँ | ‘देहाती दुनिया’ का ‘भोलानाथ’ ‘मेरा बचपन’ का ‘भोलानाथ’ ही है,
और उपन्यास के दूसरे अध्याय से ‘रामसहर ’ की जो कहानी आगे बढती है, वह ‘मेरा बचपन’
के ‘भोलानाथ’ की कहानी का ही औपन्यासिक रूप बन जाती है | उपन्यास के पाँचवें
अध्याय में यह रहस्य खुलता है जब ‘देहाती
दुनिया’ का ‘भोलानाथ’ कहता है –
हमारे नाना को
कोई लड़का नहीं था | वह बाबू सरबजीत सिंह के बड़े पुराने दीवान थे |...नाना के
गुजरते ही (बाबू सरबजीत सिंह के बेटे) रामटहल सिंह ने हमारी नानी से कहा – अपने
दामाद को बुलवाइए | नहीं तो मेरी जमींदारी मिटटी हो जायगी और आपका काम-धाम भी चौपट
हो जाएगा | नानी की बुलाहट पर बाबूजी और मइयां के साथ हम भी राम सहर गए | बचपन में
भी एक बार हम वहां गए थे | उस समय दुधमुंहे बच्चे थे |
‘रामसहर’ की
‘देहाती दुनिया’ मेरे पिता के जन्म-ग्राम उनवांस की ही देहाती दुनिया है, जहाँ
उनके बचपन के दस साल बीते, और जहाँ वे जीवन-भर बराबर आते और रहते रहे | ‘देहाती
दुनिया’ के सारे चरित्र – रामटहल सिंह,
पसुपत पांडे, मूसन तिवारी, सोहावन मोदी, खेदू चमार, सोनिया, सुगिया, बुधिया - सब उनवांस
वाली देहाती दुनिया के ही चरित्र थे | मेरे बचपन के समय में भी इनसे मिलते-जुलते चरित्र मेरे गाँव में,
मैंने इन्हीं आँखों से देखे थे | वास्तव
में, मेरे पिता के बचपन के उनवांस में ही उनके उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ का पूरा
कथा-संसार उतर आया था | अपने अनाम पूर्वज को ही आदि-पिता मानकर मेरे पिता ने अपने
को अपनी माता के साथ उनवांस में पुनरारोपित किया था | यहाँ तक कि उनके उपन्यास के
एक चरित्र को तो उसी रूप में मैंने अपने समय के गाँव में भी देखा था | यही था मेरे
पिता के कथा-संसार का ‘रामसहर’ जहाँ मेरा भी बचपन बीता था, यद्यपि तब मेरे पिता
शहर में आजीविका के लिए रहने लगे थे, और हम बीच-बीच में कुछ समय के लिए अपने इस
गाँव में आते और वहां रहते थे |
सुथर दास जब
अपनी ननिहाल उनवांस आये होंगे, तब का उनवांस मेरे पिता या मेरे बचपन के उनवांस से
बहुत भिन्न नहीं रहा होगा | हमारे गाँव के पूरब जो ‘कोचान’ नदी है वह तो आज भी सदानीरा है | ‘देहाती दुनिया’ में वही गंगा हो गयी है | बचपन
में हमलोग रोज़ उसी ‘कोचन’ में नहाने जाते थे | वहां मैंने वह आम का वह पेड़ भी देखा था जिसकी डाल पर ‘भोलानाथ’ झूला
झूलते थे | उसकी एक डाल नीचे की ओर इस तरह झुक आई थी कि हम बच्चे भी आसानी से उस
पर बैठ कर झूला करते थे | इसीलिए ‘देहाती दुनिया’ का ‘रामसहर’ कोई और गाँव नहीं, हमारा अपना गाँव उनवांस ही है, और उसके लगभग
सारे चरित्रों से मिलते-जुलते लोग मैंने भी अपने बचपन के उसी उनवांस गाँव में अपने
आस-पास देखा था |
अब वह गाँव
अपनी पुरानी पहचान - अपने चारों ओर अभी भी
फैले खेतों, पगडंडियों, पुराने कुछ पेड़ों और इक्के-दुक्के पुराने कुछ मिटटी के
मकानों में सिमट चुका है | ‘देहाती दुनिया’ की वह पुरानी कच्ची सड़क जिस पर डोली
में एक दुल्हन और साथ-साथ पैदल उसका दूल्हा जा रहा था, जब अपने साथियों के साथ
‘भोलानाथ’ ने चिल्ला कर दुल्हे को चिढाया
था –
रहरी में रहरी पुरान रहरी,
डोली में के कनियाँ हमार मेहरी
और दुल्हे ने
खदेड़ कर उनको ढेले से मारा था, और मेरे बचपन में भी दुपहरी में जिस सुनसान सड़क पर एक बहुत
पुराना घनी छाया वाला बड़ का पेड़ हुआ करता
था, जिसके नीचे प्यासे राहियों के लिए एक पटियों से पाटा हुआ एक बड़ा सा पक्का कुआं था – वह सड़क अब एक घने भीड़-भरे
बाज़ार में तब्दील हो गई है |
बचपन में और
बाद में भी अपने घर के बड़े बूढों से मैंने सुथर दास के खानदान के
पुराने दिनों की वो कहानियां सुनीं थीं, और उनमें से बहुत सी बातें नोट भी की थीं
| सुथर दास जो गाजीपुर से अपने माता-पिता के साथ आकर अपनी ननिहाल उनवांस में बस गए
थे, उनके बाद की तीसरी-चौथी पीढ़ी में अनुमानतः १८५०-५५ में मेरे प्रपितामह देवी
दयाल का जन्म लीला दास के पुत्र के रूप में हुआ था | अपने चार-पांच भाइयों में वे
सबसे छोटे थे, लेकिन दीन-दुनिया और घर की खेती-बारी में उनका मन बिलकुल नहीं लगता
था और वे हमेशा धर्म-ग्रंथों (योग वाशिष्ठ्य, विष्णु पुराण, आदि) के पाठ , जप और
पूजा-पाठ में ही लगे रहते थे | उनके भाइयों ने तंग आकर उनको अपने से अलग कर दिया
था – कुछ बेकार-बंजर जमीन और महुए आदि के कुछ पेड़ देकर |
मेरी
प्रपितामही भी - जो मेरे पिता (शिवपूजन सहाय) के बचपन में कुछ दिन जीवित रही थीं,
और जिनका नाम ‘नारायणी’ था – मेरे प्रपितामह (देवी दयाल) के धर्माचरण और भक्ति-भाव में पूरी तरह उनका साथ
देती थीं | उनके कई पुत्र हुए जिनमें मेरे पितामह – श्री वागीश्वरी दयाल उनकी सबसे
बड़ी संतान थे | उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी | किसी तरह मेरी प्रपितामही
ने अपने बड़े बेटे वागीश्वरी दयाल और अन्य पुत्रों
की प्रारम्भिक शिक्षा का कुछ प्रबंध करके
उम्र होने पर उनको इस लायक बनाया और इस तरह वागीश्वरी दयाल आरा के एक ज़मींदार बक्शी
हरिहर प्रसाद सिंह के उनवांस इलाके की ज़मींदारी के पटवारी बहाल हो गए, और तब मेरे
पिता के बचपन में परिवार की स्थिति धीरे-धीरे सुधरने लगी | उन्होंने लिखा है, उनके बचपन में घर में ३०
गायें थीं जिनमें १० हमेशा दुधार रहती थीं | घी-दूध की भी पूरी आफियत हो गयी थी | परिवार भी बड़ा था
| यह पूरी कहानी मेरे पिता ने ‘मेरा बचपन’ में विस्तार से लिखी है |
हमारा वह
पुराना घर
अपने जन्म और
शैशव की कहानी तो मेरे पिता ने ‘मेरा बचपन’ में लिखी है, लेकिन उस पुश्तैनी घर की
भी अपनी कहानी है जिसके दखिनवारे कमरे में मेरे पिता का जन्मा हुआ था | यह कहानी मैंने घर के बुजुर्गों से सुनी थी, लेकिन वह पुराना
घर अब पूरी तरह ढह चुका है | मेरे पितामह वागीश्वरी दयाल (मृ.१९०६) को पांच बेटे और दो
बेटियां हुईं, जिनमें दो बेटों की कम उम्र में ही मृत्यु हो गई | (मेरी पितामही की
मृत्यु १९१६ में हुई |) वागीश्वरी दयाल के
तीन बेटों में बड़े मेरे पिता शिवपूजन सहाय(ज.१८९३), मंझले रामपूजन लाल
(ज.१८९८) तथा छोटे देवनंदन लाल(ज.१९०१) थे | बड़ी बेटी (जो मेरे पिता से बड़ी थीं)
की शादी मुंशी कालिका प्रसाद (बम्हवार) से हुई थी और छोटी की शादी आरा के पास
कटेयाँ में हुई थी | आरा में अपनी पढ़ाई के
समय मेरे पिता मेरी इसी छोटी बुआ के यहाँ रहे थे | उससे पूर्व, आरा में १९०३ में
स्कूल-प्रवेश के पहले, मेरे पिता और दोनों चाचा ने अपनी छोटी चचेरी बहन के यहाँ
(बगेन में, रघुनाथपुर स्टेशन से दक्षिण) और फिर कुछ दिन बड़ी बहन के यहाँ (बम्हवार
में ) रह कर अपने बहनोई लोगों से उर्दू-फारसी और अंग्रेजी की शुरूआती तालीम हासिल
की थी |
नाम में लगाने
वाला पुछल्ला दास से शुरू होकर दयाल तक कैसे पहुंचा था, इसका कुछ पता नहीं है | और
फिर मेरे पिता ने तो खुद उसको सहाय में
बदल लिया | उनके पितामह देवीदयाल कब दास से दयाल बने यह भी ठीक-ठीक बताना कठिन है
| फोटो का तो वह ज़माना ही नहीं था, या केवल ज़मींदारों और रजवाड़ों में फोटो या
पेंटिंग की तस्वीरें होती थीं. या फिर शहरों में संपन्न लोगों के यहाँ फोटो
खिंचवाए जाते थे | मेरे पिता जब ६-७ साल के थे (१९०० ई.) तब उनकी पितामही का
देहांत हुआ था | उनको याद करते हुए वे लिखते हैं : “उसका शरीर बहुत गोरा और सुन्दर
था | सयाना होने पर मेरे ध्यान में आया कि मेरे पिता और बड़े चाचा का चेहरा उसी के
सामान था | मेरी माता कहती थी कि मेरे छोटे चाचा हूबहू मेरे दादा के सामान थे |
अपने दादा को मैंने नहीं देखा था |”
मेरे पितामह वागीश्वरी
दयाल का शहर से तो रिश्ता बन गया था पर उनकी भी कोई तस्वीर मेरे पिता के पास नहीं
थी |उनकी बस लिखावट मिली है - उनकी एक पढाई की कॉपी में जिसमें उन्होंने नागरी
लिपि में कंडे की कलम से लिखा है – “मालिक ई किताब बगेसर देयाल मौजा: उनवांस”|
उनकी हिसाब-किताब की एक कॉपी भी हमारे पारिवारिक संग्रह में है, जिसमें उनकी
लिखावट है |
मेरे बचपन में
हमारा जो पुश्तैनी मकान था उसको मेरे चाचा रामपूजन लाल ने बनवाया था, जो
घर-गृहस्थी के मालिक-मुख्तार थे | उनकी तस्वीर हमारे पास है | मेरे पिता तो स्कूल
की पढ़ाई के बाद शहर में ही रह कर स्कूल-मास्टरी कर रहे थे, इसलिए खेती-बारी का जो
लम्बा-चौड़ा सिलसिला हो गया था उसे रामपूजन लाल गाँव पर ही रह कर देखते थे | कहते
हैं उस समय, मेरे पितामह वागीश्वरी
दयाल की पटवारीगिरी और उनके और भाइयों की तहसीलदारी
की वजह से परिवार में लगभग ढाई सौ बीघे
खेत की मिलकियत थी, लेकिन पारिवारिक मसलों में वह १९४५ आते-आते डेढ़ सौ बीघे तक आ
गई थी | रामपूजन लाल ही सब कुछ देखते-सम्हालते थे, लेकिन अचानक १९३० में टाइफाइड
बुखार से उनकी मृत्यु हो गई |
मेरे पिता उन
दिनों बनारस में सपरिवार रहते थे | यों भी खेती-बारी की हिस्सेदारी में उनकी शुरू
से कोई दिलचस्पी नहीं रही | वे घर के पहले व्यक्ति थे जो शहर में जाकर स्कूल की
सरकारी नौकरी करने लगे थे | पारिवारिक कलह-क्लेश से वे बराबर दूर रहना चाहते थे |
रामपूजन लाल के मरने के बाद घर-गृहस्थी के मालिक अब सबसे छोटे भाई देवनंदन लाल बन
गए थे, और संपत्ति और उपभोग को लेकर घर में गृह-कलह बढ़ गया था, जैसा मेरे पिता के
पत्राचार में बार-बार उजागर होता है – खास कर ‘उग्र’ और रामगोविंद त्रिवेदी के
पत्रों में, जिनसे शिवजी (मेरे पिता) अपना
सारा दुखड़ा खोल देते थे | शिवजी को बार-बार इस घरेलू कलह में बीच-बिचाव करना पड़ता
था, जैसा उनकी कुछ पारिवारिक चिट्ठियों से पता चलता है | लेकिन यह तो प्रायः हर
भारतीय परिवार का किस्सा है | अंततः १९४५ के आसपास खेती-बारी, ज़मीन-जायदाद का तीन
हिस्सों में बंटवारा हो गया जिसके लिए शिवजी को राजेंद्र कॉलेज, छपरा से गाँव आकर
निबटारा करना पड़ा | बंटवारे में हर फरीक – तीनों भाइयों के हिस्से लगभग ५०-५० बीघे
जमीन आई | खानगी (आपसी) बंटवारे का वह कागज़, उस समय के और इस तरह के बहुत से
कागजों की तरह, मेरे पिता के संग्रह में आज भी वर्त्तमान है, जिसकी अब शायद केवल रद्दी की कीमत समझी जायेगी |
बंटवारे में
गाँव के पुश्तैनी मकान का भी बंटवारा हो गया | बड़े से आंगन और चौकोर बरामदों के
साथ बारह कमरों में चार-चार कमरों का हिस्सा तीनों फरीकों को मिला | मेरी उम्र इस
वक़्त तक ७-८ साल की हो गयी थी, और बाबूजी (मेरे पिता) ने मेरी दो बहनों – सरोजिनी
और बिनोदिनी को गाँव वाले इस घर में ही खेती-गृहस्थी सम्हालने के लिए रख दिया था |
तीनों फरीक एक ही बड़े आँगन में रहते थे, जिसके बीचों-बीच एक बेल का पेड़ था जिसमें
खूब फल लगते थे और चिड़ियों का बसेरा रहता था | मेरा बचपन भी ज़्यादातर अपने बड़े भाई
और दो बहनों के साथ उसी आँगन में बीता था, दो चाचियों की देख-रेख में, जिसमें मझली
विधवा चाची बहुत गोरी और सुन्दर थीं, और बराबर गले में मोटी-सी सोने की हंसुली
पहने रहती थीं | छोटी चाची का स्वभाव कुछ झगडालू था और वे बहुत हकलाती भी थीं,
जिससे ऐसे प्रसंगों की नाटकीयता हमलोगों के लिए बहुत बढ़ जाती थी |
चिट्ठियों से
और देखते-सुनते मुझको मालूम हो गया था कि मेरी दोनों चाचियों के कलह के कारण ही
मेरी माँ को भी बाबूजी ने ज़बरदस्ती गाँव पर रहने को मजबूर किया था | लेकिन चार बच्चों को जन्म देने के बाद लहेरियासराय में ही उसका स्वास्थ्य तेज़ी
से गिरने लगा था, और फिर गाँव परिवार में
गोतिनियों के कलह के कारण बाबूजी को जबरदस्ती, माँ की अनिच्छा के विरुद्ध,
उन्हें छपरा से गाँव भेजना ही पड़ा |फलतः, गाँव में दवा-इलाज की कोई व्यवस्था न
होने के कारण छपरा से उनवांस आने के कुछ ही महीनों बाद १६ नवम्बर, १९४० को मेरी
बीमार माँ का दुखद अंत हो गया | मैं तो अभी माँ की गोद में ही था,जिसकी बहुत
धुंधली सी याद कहीं मेरी स्मृति में रह गयी है - कि बीमारी की हालत में अपने
(पूरबारे) हिस्से की कोठरी में खाट पर लेट कर वह मुझको दूध पिला रही है | पर उसके मरने
की कोई याद मेरी स्मृति में नहीं है | मेरी दो बहनें और बड़े भाई, आनंदमूर्ति तब
वहीँ थे | बाबूजी को तार देकर छपरा से बुलाया गया था और तब गंगा के किनारे बक्सर
के चरित्रवन स्मशान घाट पर माँ का दाह-संस्कार हुआ था | यह बहुत अच्छी तरह याद है
कि माँ के मरने पर लखनऊ से निकलने वाली ‘सुधा’ पत्रिका बाबूजी के पास गाँव पर आई
थी जिसमें मुखपृष्ठ पर माँ का चित्र छपा
था, और उसको देखकर हम चारों भाई-बहन बहुत देर तक आँगन में खूब रोते रहे थे | आज यह लिखते हुए भी मेरी आँखें भर
आई हैं | घर-गिरस्ती की देखभाल के नाम पर चाचियों ने बाबूजी को मजबूर कर दिया था
कि हमारी माँ को गाँव में ही रहना होगा, और इसी जिद में उसकी जान चली गयी | इस बात को हम चारों भाई-बहन जीवन में कभी
भूल नहीं सके |
जब माँ का
देहांत हुआ था तब पहले हमलोग मकान के दक्षिण-पूरबी हिस्से में रहते थे |
उत्तर-पूरब का हिस्सा मंझले चाचा का था | पच्छिम का हिस्सा छोटे चाचा का था जो अब
पूरी खेती-बारी के मालिक और मुखिया थे और गाँव में सब लोग उनको देवानजी या मुखियाजी कहते भी थे | गाँव
जवार में कुछ मेरे पिता की साहित्यिक
प्रसिद्धि के कारण भी, मैंने अपने बचपन में देखा था, मेरे छोटे चाचा का बहुत बड़ा
रुतबा था | बाबूजी के यश के कारण ही पंचायती राज कायम होने के बाद मेरे छोटे चाचा
पंचायत के पहले निर्वाचित मुखिया भी हो गए थे | इस समय तक मैं कॉलेज में पढने लगा
था | बाबूजी राजेंद्र कॉलेज से त्यागपत्र देकर बिहार राष्ट्र-भाषा परिषद् के मंत्री
पद पर पटना आ गये थे | छपरा में रहते हुए
ही दोनों बहनों और बड़े भाई की गाँव से ही शादी हो गई थी | छोटे चाचा ने मकान में
अपना पछिमारा हिस्सा कुछ मुआवज़े के साथ
छोड़कर और पुराने पुश्तैनी मकान से उत्तर थोडा हटकर अपना नया पक्का मकान बना लिया
था और उनका परिवार उसमें चला गया था | यह तभी हुआ था जब तीनों भाइयों में खानगी
बंटवारा हुआ था | अब मेरी बहनें और नई चंदा भाभी (नवजादिक लाल की तीसरी बेटी)
पुराने वाले मकान के छोटे चाचा वाले आधे पश्चिमी हिस्से में रहने लगे थे | बाबूजी
का वागीश्वरी पुस्तकालय जिसकी अस्त-व्यस्त सामग्री पहले दक्षिण-पूर्व भाग के एक
कमरे में जैसे तैसे बोरों में या लकड़ी के देहात में बने रैकों पर रखी थी, अब
बाबूजी ने छपरा में रहते ही पुस्तकों के लिए अलमारियां बनवाकर भेज दी थीं और अब
पुराने घर के पश्चिमी भाग के एक लम्बे कमरे में पुस्तकालय काफी व्यवस्थित हो गया
था |
कुल मिलाकर
देवी दयाल से लेकर उनके पोते रामपूजन लाल के समय तक जब केवल वागीश्वरी दयाल के
वंशज एक साथ रह गए थे, क्योंकि देवी दयाल के वंश-वृक्ष की और शाखाएं फलित नहीं
हुईं, अथवा अन्यत्र जा बसीं, और उनमें जो लड़कियाँ (फूफियाँ) हुईं वे अन्यत्र ब्याह
कर चली गयीं, अतः वागीश्वरी दयाल की मृत्यु (१९०६) के समय उनके दो भाई और
वागीश्वरी दयाल के तीन बेटे (शिवपूजन, रामपूजन और देवनंदन ) ही रह गए थे | इसीलिए
तीनों भाइयों की शिक्षा आगे नहीं बढ़ सकी, और संयुक्त परिवार में उनके विवाह का कार्य
सब वागीश्वरी दयाल के दो भाइयों – रामबृक्ष लाल और शिवगोविन्द लाल ने ही किसी
तरह पूरे किये | इतना अनुमान है कि जो पुश्तैनी मकान मेरे होश में था, और जिसे
रामपूजन लाल ने १९२५ के आसपास बनवाया था, उससे पहले ही उनके दोनों चाचा लोगों की
मृत्यु हो चुकी थी, और इसी लिए रामपूजन लाल की मिलकियत में ही नया मकान बना | जब
१९४५ में अंतिम बंटवारे के बाद पूरा होश
सम्हालने के बाद मैंने अपने चाचा और दोनों चाचियों से जानकारी ली तो पता लगा कि इस
नए मकान के बनने से पहले एक शामिल कच्चा मकान इसके चबूतरे से थोडा आगे था जिसकी दालान पूरब-मुखी
थी | उसके पश्चिमी हिस्से में वागीश्वरी दयाल का परिवार रहता था और पूरबी हिस्से
में देवी दयाल के एक चचेरे भाई (वागीश्वरी दयाल के एक अन्य शाखा के चाचा*) बाबूलाल दास के वंशज रहते थे |
परिवार में हो
रही वृद्धि के बीच वागीश्वरी दयाल ने पहले के पुराने मकान से उत्तर आगे एक और
मकान अपने परिवार के लिए बनवाया था | आज
उसी जगह पर सबसे छोटे चाचा देवनंदन लाल के परिवार का मकान है जो १९४५ के बाद मेरे
होश में बना था | मेरे होश में जो मकान था जिसे अभी ध्वस्त किया गया है, उसे
रामपूजन लाल ने फिर उसी जगह पर बनवाया जहाँ से उत्तर हट कर वागीश्वरी दयाल ने बढ़ते
हुए परिवार के लिए अपना नया मकान बनवाया था | इस तरह देवी दयाल के समय पुराने समय
से चला आ रहा मकान था, जहाँ से उत्तर हट कर वागीश्वरी दयाल ने बड़ा मकान बनवाया, और
फिर उनके मरने के बाद उनके बेटे रामपूजन
लाल ने वह हालिया मकान बनवाया जो आखिरी शामिल मकान था, जो मेरे होश में हमलोगों का
आखिरी मकान था, और जिसकी मेरी खींची हुई
तस्वीर अब हमारे पास है |
इसी आखिरी मकान
में हमलोगों का परिवार और रामपूजन लाल के
एकमात्र पुत्र श्री शारदारंजन प्रसाद का परिवार ( वे, उनकी पत्नी, और उनकी माँ,
हमारी चाची, श्री रामपूजन लाल की विधवा ) क्रमशः पश्चिन और पूरब की और रहने लगे |
(चाचा देवनंदन लाल ने अपना अलग मकान १९४५
के बंटवारे के बाद उत्तर वाली उसी जगह पर बनवा लिया जहाँ वागीश्वरी दयाल ने पहले
बढ़ते परिवार के लिए अपने समय में नया मकान बनवाया था, जो छोटे चाचा देवनंदन लाल के
नए मकान के रूप में आज भी कुछ परिवर्त्तित हालत में मौजूद है |)
जब मैं कॉलेज
में पढने लगा था, चाचा देवनंदन लाल का नया मकान अलग बन चुका था | रामपूजन लाल वाले
मकान में अब दो हिस्सेदारों का परिवार ही रहता था – हमारा और रामपूजन लाल का | इसी
समय हमलोग छपरा से उनवांस आकर इस मकान के
पच्छिमी हिस्से में रहने लगे थे, और उसके पश्चिम-उत्तर वाले लम्बे कमरे में बाबूजी
के पुस्तकालय की किताबें चार-पांच आलमारियों में और कुछ लकड़ी के रैकों पर रखी गयी थीं
| मेरे बड़े भाई तब मैट्रिक के छात्र थे और बक्सर में ही पढ़ रहे थे | मुझे
याद है वे उसी लाइब्रेरी में अन्दर से
दरवाजे की किल्ली बंद करके केवल अपनी एक आलमारी-भर अंग्रेजी की किताबें सुबह से
देर शाम अँधेरा होने तक पढ़ते रहते थे | और
शाम को तफरीह के लिए हम सब लोग पोखरा या नदी की ओर सैर के लिए जाया करते थे |
रामपूजन लाल
वाले इसी मकान में वह ख़ास कमरा था (जो उन दिनों सबसे पहले वाले उस मकान में पश्चिम-दक्खिन
कोने की ओर रहा होगा, और जो अब हमारे हिस्से में पड़ता था ) जिसका उपयोग
प्रसूति-गृह की तरह होता रहा था, और इसी में मेरी पितामही (राजकुमारी देवी) के सभी
बच्चों का (और शिवपूजन सहाय का) जन्म हुआ था | उस सबसे पुराने (देवीदयाल के समय
वाले) मकान के इसी कमरे को जो उस समय भी
मिटटी का और खपरैल ही रहा होगा, देवता-पित्तर का घर (पूजा- घर) माना जाता था | प्रस्तावित
निर्माणाधीन स्मारक में इसी स्थान पर एक विशेष प्रस्तर पट्टिका लगायी जाएगी |
अब कुछ मेरी
अपनी कहानी |
मेरे जीवन के
पहले दो-ढाई साल लहेरिया सराय में बीते थे | मेरे पिता १९३५ में अंतिम रूप से काशी
से अपना परिवार लेकर लहेरिया सराय चले आये थे जहां वे मुख्य रूप से पुस्तक भण्डार
से प्रकाशित होने वाली पुस्तकों और मासिक
पत्र ‘बालक’ का संपादन करते थे | शुरू में
वहां वे कुछ दिन पुस्तक भण्डार के परिसर में ही बनी एक झोपड़ी में सपरिवार रहते थे
| कुछ ही दिन पहले १९३४ के भूकंप में पुस्तक भंडार के सभी मकान मलबा बन गए थे और
तभी ये झोपड़ियां बनाई गई थीं | बाद में बाबूजी अपना परिवार लेकर वहां बंगाली टोला
के एक मकान में चले गए थे |
काशी में बाबूजी
दस साल (१९२६ से १९३५ तक ) रहे थे | वहीँ १९२६ में उनकी दूसरी पत्नी का क्षय रोग
से निधन हुआ था और १९२८ में तीसरा विवाह हुआ था | मेरे तीन भाई-बहनों का जन्म वहीँ
क्रमश: – आनंद्मूर्त्ति का (१९२९ में ), बड़ी बहन सरोजिनी का (१९३३ में ) और छोटी
बहन का (१९३५ में ) हुआ था | बाबूजी १९३५ से कुछ वर्ष पहले ही पुस्तक भण्डार की
नौकरी में लहेरिया सराय चले गए थे, और परिवार काशी में ही था | भूकंप के समय भी वे
लहेरिया सराय में ही थे, और बहुत कठिनाई से काशी में अपने परिवार के पास पहुंचे थे | भूकंप का असर काशी
में कम हुआ था | लहेरिया सराय आने पर जब बाबूजी अपना परिवार लेकर बंगाली टोला वाले
मकान में चले गए, तब उसी मकान में १९३७ में मेरा जन्म हुआ | वहाँ रहते हुए ही
आनंदमूर्त्ति, सरोज और बिन्दू का नाम पास के स्कूल में लिखवाया गया था | शैशव के
उन दिनों की बहुत धुंधली-सी एकाध तस्वीरें मेरी स्मृति में रह गयी हैं | लहेरिया
सराय में ही माँ का स्वास्थ्य गिरने लगा था, और वह बीमार रहा करती थी | गाँव में
रिश्ते में छोटी पर उम्र में बड़ी जो दो गोतिनियाँ थीं वे मेरी माँ के शहर में रहने
से द्वेषालु रहती थीं और उनका दबाव था कि उनकी बड़ी गोतिनी भी अब शहर से गाँव में ही
आकर रहे और अपने हिस्से की खेती-बारी का हिसाब-किताब खुद संभाले | मेरे पिता की चिट्ठियों में इन बातों
का बार-बार ज़िक्र आता है, और अंततः छपरा आने के कुछ ही दिन बाद द्वेषालु गोतिनियों
के इसी दबाव में माँ को रहने के लिए गाँव
जाना ही पड़ा – और मैं तो अभी उसकी गोद में ही था – लेकिन पहले से ही बीमार रहने के
कारण और गाँव में इलाज की सुविधा न होने
से उसको वहां कुछ ही दिन बाद अपनी जान
गवानी पड़ी |
मेरी दोनों
बहनों का विवाह भैया के विवाह से एक साल पहले १९४८ की गर्मी-छुट्टी में, अप्रैल-मई
में, गाँव से ही हुआ था | बाबूजी सरोज दीदी के विवाह के समय गाँव में ही गंभीर रूप
से टाइफाइड से बीमार हो गए थे,और केवल
अपनी इच्छा-शक्ति से और पास के किसी एलोपैथ डॉक्टर की देख-रेख से मुश्किल से बचे
थे | अगली गर्मी-छुट्टी में भैया का विवाह बलिया के पास के गाँव चिलकहर में मुंशी
नवजादिक लाल की तीसरी बेटी चंदा से हुआ |
मुंशीजी की दूसरी बेटी तारा मेरे चाचा देवनंदन लाल के छोटे बेटे मनोरंजन से ब्याह
कर चाचा के हमारे नये घर में पहले ही आ
चुकी थी | मुंशीजी ‘मतवाला’-मंडल (कलकत्ता) में बाबूजी के साथी रहे थे, और १९३९
में उनके मरने के बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यधिक शोचनीय हो गई थी |
सबसे बड़ी लड़की की शादी तो वे अपने समय में कर चुके थे, लेकिन उनकी विधवा के सामने अभी
तीन बेटियाँ और दो बेटों के पालन-पोषण का दुर्वह भर था | नवजादिक लाल की विधवा की
सहायता के लिए निरालाजी और मेरे पिता बराबर प्रतिबद्ध थे, और उसी क्रम में उनकी दो
बेटियाँ हमारे घर में ब्याह कर आई थीं | तीसरी बेटी का विवाह भी मुझ से तय था
लेकिन उसका कुछ दिन बाद ही देहांत हो गया था | भाई-बहनों की इन शादियों की, और
दोनों भाइयों के बरात में शाहबाला बनकर चिलकहर जाने की याद मुझे अच्छी तरह है |
लेकिन उन यादों की तो एक लम्बी श्रृंखला ही है स्मृति में जिनकी चर्चा किसी और
प्रसंग में शायद कभी आगे होगी |
मेरे गाँव की अपनी यह एक लम्बी कहानी है, और
इसके सुनने या पढने वाले लोग भी सब अपने हैं | यह मेरे गाँव की इस कहानी से ही
मेरे जीवन की कहानी शुरू हुई, और मैं उसी कहानी को किसी किताब की तरतीब से नहीं
लिख रहा हूँ, बल्कि जैसे जैसे जो कुछ एक याद से जुड़ी कोई और याद आती है, उसे लिखता
जा रहा हूँ | और मुझे यह भी नहीं मालूम मैं क्यों इसे लिख रहा हूँ, या कैसे ये
कहानी खुद ही जैसे अपने को लिख रही है | मुझे
यह भी नहीं पता इसमें मैं क्या-क्या लिखने जा रहा हूँ, क्योंकि जैसा मैंने कहा यह
कहानी अपना रास्ता खुद तय कर रही है | मैं बस इसके पांव की तरह हूँ | मेरा काम
केवल आगे चलते जाना है | किधर जाना है, यह इस कहानी को ही मालूम है |
मेरी स्मृति
में अपने वंश-वृक्ष के जिन लोगों को मैंने इन आँखों से देखा था, उनके बारे में मैं
अक्सर सोचने लगता हूँ | उनमें से मेरे पितामह वागीश्वरी दयाल की शाखा में मेरे
पिता के पहले जन्मे कई भाइयों का तो बाल्यावस्था में ही निधन हो चुका था, पर मेरे मंझले चाचा रामपूजन लाल का देहांत १९३०
में हुआ था | बाबूजी से बड़ी बहन फुआ (मनबसिया) जो आरा के पास बम्हवार में ब्याही
थीं, उनको और उनके परिवार में और सभी लोगों को मैंने देखा था, यद्यपि मेरे फूफा मुंशी
कालिका प्रसाद बहुत पहले ही गुज़र चुके थे | फुआ के दोनों लड़कों – बिन्ध्येश्वरी
भैया और सिद्धेश्वरी भैया और उनके बच्चों
से तो बराबर मिलना-जुलना भी हुआ | दुःख की
बात कि अब मेरी पीढ़ी में उनमें से भी कोई नहीं रहा | बिन्ध्येश्वरी भैया की एक ही लड़की थी जिसकी शादी मुंशी नवजादिक लाल
जी के बड़े लड़के प्रकाश से हुई थी लेकिन अब उस परिवार में भी उस पीढ़ी में कोई नहीं
रह गया है | और उन लोगों के बाद की पीढ़ी के लोग तो अब न जाने कहाँ-कहाँ बिखर चुके
हैं | छोटी कटेयाँ वाली बुआ को मैनें नहीं देखा था; शायद उनका देहांत मेरे होश से
पहले ही हो चुका था | उस परिवार के फुफेरे भाई कमला भैया और कैलाश बिहारी भैया
मेरे होश में आते-जाते थे |
मेरे पिता
अपने संग्रह में छोटे-से छोटे कागज-पत्तर भी संभाल कर रखते थे, और उनके संग्रह
में, साहित्यिक विविध सामग्री ही नहीं, पारिवारिक ऐसे सभी कागज़-पत्तर भी सुरक्षित
संगृहीत हैं | गाँव से इस सारी सामग्री को पटना लाने में इनमें से कुछ कम महत्त्व
की चीजें तो अवश्य छांट दी गयीं, पर विशेष महत्त्व की प्रायः सभी सामग्री आज भी
हमारे संग्रह में सुरक्षित है | बाबूजी तो पत्रिकाओं के रैपर और समारोहों-सभाओं के
निमंत्रण-पत्र तक सुरक्षित रखते थे, और ऐसी सारी सामग्री भी बहुलान्शतः आज भी सुरक्षित है| बाबूजी के निधन के बाद मैं
इस मामले में और सावधान हो गया, और ऐसी जितनी चीजें थीं उन पर विशेष ध्यान रखने
लगा | जब १९९३ में बाबूजी के नाम पर हमलोगों ने एक न्यास की स्थापना कर दी, तब ऐसी
सारी सामग्री उसके अंतर्गत पटना में सुरक्षित रखी गयी है | हालांकि अब आगे उस तरह की सारी सामग्री की सुरक्षा मेरे परिवार के लोगों की ही जिम्मेवारी
है |
बाबूजी के
निधन के वर्षों बाद जब रामविलास जी निराला की जीवनी लिख रहे थे, और मैं उनसे मिला था, तब उन्होंने मुझको बाबूजी के
जीवन से सम्बद्ध हर प्रकार की सामग्री और सूचनाओं को सुरक्षित रखने और उनपर नोट्स
बनाकर रखने की सलाह दी थी | हालांकि मैं तो शुरू से इस काम में लगा रहता था | इसी
क्रम में मैं अक्सर गाँव जाता था, क्योंकि गाँव की खेती का सिलसिला अभी पूर्ववत चल
ही रहा था, और उसकी देख-रेख का भार अब मुझ पर ही था | पुस्तकालय भी उस समय तक वहीँ
था | मैं अपने छोटे चाचा से (जिनकी मृत्यु १९७२ में हुई) और घर के पुराने लोगों से
बीते दिनों की जानकारी बटोरता रहता था | उन्हीं से यहाँ पता लगाया कि हमारा पुश्तैनी
घर गाँव में कहाँ और कैसे था, और उन्हीं से वंश-वृक्ष की जानकारी भी मिली, क्योंकि
मेरे छोटे चाचा भी कागज-पत्तर के मुंशी थे और लोग उनको मुंशी देवनंदन लाल कहते भी थे|
हमारा
वंश-वृक्ष
चाचा की डायरी में ही मुझको हमारा वंशवृक्ष लिखा मिला था, पर बाद में मैंने अपनी छोटी चाची से पूछ कर भी उनकी याददाश्त के अनुसार उसमें कुछ और जोड़ा | मेरी अभिरुचि शुरू से इसमें बहुत गहरी रही के मेरे पूर्वज कौन थे और उनके बारे में जानकारी की तफसीलें क्या थीं | चाची वाले (याददाश्ती) विवरण और चाचा की डायरी में लिखित विवरणों में कई जगह थोडा-थोडा अंतर था, पर चाचा का विवरण ही अंततः प्रमाणिक मानने योग्य था, क्योंकि चाचा की लिखा-पढ़ी बहुत पक्की होती थी | ( नीचे विस्तार से दिए गए वंश-वृक्ष-विवरण में कहीं-कहीं कुछ भ्रम उत्पन्न होता है, लेकिन मैंने यथासंभव उसको सही ढंग से सुलझाने का ही प्रयास किया है | इस विवरण में सबकी रुचि नहीं हो सकती, इसलिए इसे नज़र-अंदाज़ भी किया जा सकता है |) वह विवरण कुछ इस प्रकार है -
पहले पूर्वज
जो अपने पिता (जिनका नाम ज्ञात नहीं है) के साथ ननिहाल (उनवांस) में आकर बसे
(‘देहाती दुनिया’ के ‘भोलानाथ’), वे थे – [१]सुथर दास -> उनके पुत्र लीला दास -> पुत्र देवी
दास या देवी दयाल
[१] देवी दयाल (शिव के पितामह) [७ संतान] -> १. बेटी(बगेन) २. बेटी(कुकुडहाँ) ३.बेटी
(सोनबरसा) ४. वागीश्वरीदयाल
(शिव के पिता) ५.रामबृक्ष लाल ६. शिवगोविन्द लाल ७. रामगोविंद लाल (शिव के चाचा और बुआ लोग)
(४). वागीश्वरी दयाल -> १. मनबसिया
(सबसे बड़ी पुत्री, ब्याही-बम्हवार) २.
विश्वनाथ ३. भोलालाल (नकछेदी?) ४.जागालाल(२,३,४,मृ.२-३ वर्ष की आयु ) ५. भागमानी (ब्याही-कटेयाँ,
पुत्र मंगला भैया , टुनटुन, कमला भैया ?) ६. शिवपूजन सहाय (ज.१८९३)
७. रामपूजन सहाय (ज.१८९८) ८. हरिनन्दनलाल(परसियां ससुराल, परिवार मृत) ९. देवनंदन
लाल (ज.१९०१)
(५) रामबृक्ष लाल -> पुत्रियाँ : १.बताको (३१ मृत ) २.लखरानो
(बक्सर फुआ, दोनों निमेज़ में ब्याहीं; बताको की भतीजा और लखरानो की चाचा से शादो )
३. शांति (इटाढ़ी)
[६] शिवगोविन्द लाल -> १. देवराज (ज. १८/११/०९ हैजा मृत्यु/ ५) २. छबीला लाल ३ . केसरा (कटेयाँ) ४. धनेसरा (दहिवर –मृत) ५.
कुलवांतो (नोनहर) ६. विवाहित मरी
यहाँ तक के
विवरण चाचा और चाची दोनों के अनुसार अधिकांशतः मिलते हैं | चाची के मौखिक विवरण
में पुत्रियों की तफसील का विस्तार अधिक है, और थोडा अंतर भी है : जैसे चाची के
अनुसार सुथर दास के दो बेटे थे – १. देवी लाल और २. शीतल लाल | देवी लाल के एक ही बेटे थे लालजी लाल और उनके बेटे थे वागीश्वरी
दयाल, अर्थात वागीश्वरी दयाल प्रपौत्र थे सुथर दास के, जैसा चाचा के वंश-वृक्ष (और
‘समग्र’) में भी अंकित है | चाची की
स्मृति में नामों का कुछ विभ्रम संभव है, और चाचा के लिखित विवरण के अधिक प्रामाणिक
होने की संभावना भी स्पष्ट है | लेकिन चाची
के विस्तृत विवरण में वंश की पुत्रियों के विषय में अधिक विस्तार से सूचना मिलती
है और उसके सही होने की भी पूरी संभावना है, क्योंकि उसका सत्यापन भी खोज-ढूंढ से संभव है | चाची के मौखिक विवरण के अनुसार :
[२ ख] शीतल लाल [ वागीश्वरी लाल के दादा थे देवी लाल और परदादा, सुथर लाल; और शीतल
लाल वागीश्वरी लाल के चचेरे दादा थे]
चाची के
विवरण में आगे है:
[२ ख] शीतल लाल -> १.बंधन लाल (निस्संतान) २. धोंधालाल -> [ जुगुल लाल-> एक बेटी
कंडसर ब्याही ] ३. जानकीलाल (मृ.) ४. बाबूलाल दास ५. लीला लाल ->[१.राधालाल २.गोपीलाल ३.हरिकिसुन लाल (लोधास, ५ बेटा, २ बेटी)
४. बाबूलाल दास -> १. शिवप्रकाश लाल २. शिवध्यान लाल (मृ.) ३. जुगल लाल (दो लड़की)
१. शिवप्रकाश लाल - १. रोसना
(मृ.हरपुर) २. धनवांतो (लोधास) ३. हर
ध्यान लाल ४. राम ध्यान लाल ५. कँवल लाल – मृ. ६. प्रेमलाल -> भीषम –
एक लड़की | (मृत = जो कुंवारे मरे या निस्संतान मरे|)
बाबूलाल का
ज़िक्र ‘समग्र’ में प्रकाशित वंशावली में नहीं है | वे सुथर दास के छोटे बेटे थे,
जिनसे वंश की दूसरी शाखा फूटी थी | लेकिन उस वंश के प्रेमलाल (शिव के दयाद) और
उनके बेटे भीषम को मैंने देखा था, क्योंकि प्रेमलाल मेरे समय में जीवित थे |
*चाचा की
डायरी के अनुसार जो वंशवृक्ष अंकित है उसमें सुथर दास के लड़के हुए लीला दास और एक
और (अनाम) जिनके वंश में उनके लड़के जयकरण दास और उनके पुत्र हुए दीना दास | यह
दूसरी शाखा वहीँ समाप्त दिखाई गयी है | लीला दास के ३ पुत्र हुए – लालजी दास, धोंधा दास (अविवाहित, मृत), और
बंधन दास | ‘समग्र’ की वंशावली में लीला दास के ३ पुत्रों का नाम नहीं है, जो बीच
की एक पीढ़ी रही, और इस प्रकार वंश-वृक्ष
की सीधी रेखा इस प्रकार चली : सुथर दास -> लीला दास -> (लालजी दास) -> देवी दयाल ->वागीश्वरी दयाल | (इस विवरण के
अनुसार वागीश्वरी दयाल के प्रपितामह - लीला दास-
के पिता थे सुथर दास अथवा सुथर दास के पुत्र लीला दास के प्रपौत्र थे
वागीश्वरी दयाल | अर्थात सुथर दास के बाद की तीसरी नहीं,चौथी पीढ़ी में थे
वागीश्वरी दयाल |)
लालजी दास के
एकमात्र पुत्र हुए देवी दास (या देवी दयाल, शिव. के पितामह और हमारे प्रपितामह, जो
वंश की सीधी रेखा में हुए ) और उनके छोटे
भाई, बंधन दास के ३ पुत्र हुए – शीतल दास,
बाबूलाल दास और जानकी दास | बंधन दास वाली
यह दूसरी शाखा प्रपितामह-स्थान से ही अलग हो
गयी थी |
देवी दयाल बड़े
बेटे थे (उनकी पत्नी थीं, प्रपितामही ‘नारायणी’) - उनको ५ या ६
लड़के हुए - रामसेवक लाल (मृ.८ वर्ष), राम प्रकाश लाल (मृ. २५ वर्ष),
वागीश्वरी दयाल(मृ. १९०६), रामवृक्ष लाल, शिवगोविन्द लाल, (और शायद एक और
रामगोविंद लाल) | पुत्रियां भी तीन हुई
(वागीश्वरी दयाल से बड़ी तीन बहनें, जिनका विवाह हुआ क्रमशः बगेन,
कुकुडहाँ,सोनबरिसा में ) | ( शिवजी बचपन में अपनी इसी बगेन वाली फुआ के यहाँ कुछ दिन रहकर पढ़े थे |) [उन्हीं के वंशज
शिवबालक लाल मुंगेर में मुझसे मिले थे और अपना
कुर्सीनामा दिया था जिसमें नरसिंह नारायण लाल* (शिव. के छोटे फूफा) के
चचेरे भाई यदुनंदन लाल के लड़के थे
प्रो.नागेश्वर लाल(रांची विवि)|]
वागीश्वरी
दयाल के भाइयों में रामवृक्ष लाल को ३ बेटियाँ हुईं –. बताको,लखरानो ( जिन दोनों
की शादी निमेज के एक ही परिवार में लखरानों की चाचा से और बताको की भतीजे से हुई;
लखरानो ही बक्सर वाली फुआ थीं – जिनके ५ बेटे थे – जंगबहादुर, जयबहादुर, बच्चन,
बंगाल और बड़ा बाबू और दो बेटियां थीं –
राधिका और ललिता |) रामवृक्ष लाल की तीसरी बेटी शान्ति की शादी इटाढ़ी में हुई थी |
वागीश्वरी
दयाल के दूसरे भाई शिवगोविन्द लाल की ५ बेटियाँ थीं – १.देवराज (जिसको एक ही बेटा
हुआ), २.केसरा (कटेयाँ), ३. धनेसर(दहिवर), ४. कुलवांतो (नोनहर), ५. एक अविवाहित मर
गयी थी |
वागीश्वरी दयाल की कुल ९ संतानें हुईं – १.मनबसिया (बम्भवार की फुआ, जहाँ भी बचपन में रह कर शिव.
पढ़े थे ) २.३.४. विश्वनाथ,भोला लाल, जागालाल (तीनो शैशव में ही मर गए थे, ५.
भागमानी (कटेंयां – बेटा मंगला, बेटी टुनटुन), ६. शिवपूजन, ७. रामपूजन, ८. हरिनंदन (मृत, ससुराल
परसियां में बस गए ), ९.
देवनंदन |
शिव. का बचपन
रामवृक्ष लाल (वागीश्वरी
दयाल के छोटे भाई) ही शिव. के चाचा थे जिन्होंने (बड़े भाई की मृत्यु के बाद) शिव. की
स्कूली शिक्षा को जारी रखा था और फिर उनकी शादी कराई थी, और रामबृक्ष लाल की ही बेटी थीं लखरानो, बक्सर वाली बुआ | शिव. के पिता
का तो १९०६ में ही देहांत हुआ था; शिव. की पहली शादी १९०७ में और दूसरी शादी १९०८
में दोनों बड़े चाचा ने ही कराई | लेकिन दोनों चाचा का देहांत संभवतः १९१३ से पहले हो
चुका था, जिस कारण से ही शिव. आगे की पढ़ाई नहीं कर सके थे, और १९१३ में मैट्रिक पास करते ही उन्हें बनारस में कचहरी की नौकरी करनी पड़ी थी |
मेरे छोटे चाचा
(देव नंदनलाल) के संस्मरण के अनुसार भाइयों की जन्म-तिथियाँ इस प्रकार थीं - शिवपूजन: १८९३, रामपूजन: १८९५ (दो साल छोटे),
देवनंदन: १९०१| ( इस हिसाब से वागीश्वरी दयाल का अनुमानित जन्म, १८५५-‘६० के
आस-पास का होगा ) शिव. की शुरू में उनवांस
गाँव की पढ़ाई लो. प्रा. स्कूल भुवनेश्वर पाण्डेय के द्वार पर होती थी | (देखें: मे.जी.)| फिर शिवपूजन और
रामपूजन दोनों भाई बगेन अपने छोटे फूफा
(नरसिंह ना. लाल, निस्संतान) के यहाँ* अंग्रेजी और फारसी पढ़ने गए थे, जहाँ से कुछ
दिन बाद दोनों बड़े बहनोई (मुंशी कालिका प्रसाद) के यहाँ बम्ह्वार पढ़ने गए | फिर
आरा में दोनों भाई स्कूल में दाखिल हुए थे | पिता वागीश्वरी दयाल बक्शी हरिहर
प्र.सिंह के यहाँ (महादेवाँ मुहल्ला, आरा
) पटवारी के पद पर काम करते थे | वागीश्वरी दयाल के देहांत (१९०६) के बाद उनके दो भाई - रामवृक्ष लाल और शिवगोविन्द लाल भी बक्शीजी के तहसीलदार रहे – इस तरह दोनों भाई – शिवपूजन और रामपूजन की
पढाई चलती रही | १९१३ में हरनंदन (देवनंदन
से बड़े) का देहांत हो गया | तब १९१३ में
ही शिवजी बनारस में कचहरी में कुछ दिन नक़लनवीस रहे | चाचा ने अपने संस्मरण में छोटी-छोटी बहुत-सी
तफसीलें दी हैं जिनमें यह भी लिखा है कि एक बार जब शिवजी बनारस कचहरी में काम करते थे, विन्ध्याचल के
पंडों ने उनको कुछ देर के लिए दक्षिणा के लिए बंधक बना लिया था, पुलिस ने आकर छुड़ाया
था | १९१३ में के.जे.एके. में शिक्षक, हेडमास्टर दिवाकर जी थे | इस समय देवनंदन बम्ह्वार में लो. प्रा. स्कूल में विन्ध्येश्वरी
(भांजा) के साथ पढ़ते थे | १९०६ के बाद दोनों आरा शिव. के साथ के.जे.एकेडमी में
,क्लास ७ और ५में दाखिल हुए थे | इसी साल शिवजी की माँ (राजकुमारी देवी) बीमार हुई
थीं तब वे उनको अपने पास आरा ले आये थे, महादेवाँ मुहल्ले में बक्शी जी के मकान में | माँ को अतिसार रोग हुआ
था – शिवजी ही उनका मल-मूत्र धोते थे | दूसरी शादी (१९०८) वाली
पत्नी को भी शिवजी उस समय कुछ दिन के लिए आरा ले आये थे, और वे भी वहां माँ की
सेवा करती थीं | माँ अच्छी न हुईं तो फिर
घर (गाँव पर) पहुंचा दिया, जहाँ १९१६ में उनका देहांत हुआ | उस समय महादेवां
मोहल्ले में रहते हुए ही शिवजी बक्शीजी के भतीजे विन्ध्येश्वरी को पढ़ाते थे |
शिव. पहले
१९१३ में के.जे.अकेडमी में शिक्षक नियुक्त हुए थे, पर मित्रों के आग्रह पर १९१७ में टाउन स्कूल में चले गए थे
| तब वहां हेड मास्टर गिरिजापति बाबू थे | बाद में शिव महादेवां से हटकर, मिश्र
टोला में मकान लेकर सपरिवार वहां रहने लगे थे | यह मकान पं. ईश्वरी प्रसाद शर्मा के मकान के सटे पश्चिम था | उन्हीं के दालान पर
ज़्यादातर उनलोगों की साहित्यिक बैठकी होती थी | रोज़ ना.प्र. सभा जाना और ९-१० बजे रात में लौटना, यह तो बंधा नियम था
ही |
के.जे.
एकेडमी, आरा में शिव. का जनवरी, १९०३ में पांचवें क्लास में ( जो नीचे से ऊपर
गिनती में ७ वां गिना जाता था, और सबसे ऊपर क्लास १ एंट्रेंस हुआ करता था ) दाखिला
हुआ था |पहले वे अपने पिता के साथ डेरा लेकर आरा में रहते थे नौकर और रसोइया के
साथ | जब सातवें (५) में पहुंचे तब अपनी दूसरी छोटी (अपने से बड़ी) बहन भागमानी
(कटेयाँ) के डेरे में रहने लगे | छोटे बहनोई भगवानजी सहाय के पिता गोपालजी सहाय
अभिभावक रहे और बहनोई के छोटे भाई गजाधर सहाय तब उनके मित्र थे |
छोटी चाची
(देवनंदन लाल की पत्नी) की याददाश्त भी बहुत अच्छो थी | बोलने में वे ज़रूर बहुत हकला-हकला
कर बोल पाती थीं | रूप-रंग साधारण था, पर आकर्षक
नहीं | क़द में लम्बी, पर स्वस्थ थीं |
सुना था चाचा उनको कभी-कभी मारते भी थे | उनसे ये बातें मैंने २१/५ और १/६/७२ को
की थीं |मझली चाची तो तब हमारे आँगन में ही पूरब के हिस्से में रहती थीं | मुझे
अच्छी तरह याद है, उनकी गोराई बिलकुल सोने जैसी थी | गले में सोने की मोटी हंसली
बराबर पहने रहती थीं | हम बच्चों को बहुत मानती थीं | ‘लौआ-लाठी चन्दन-काठी,
इजई-बिजई पान फूल’ का खेल हमलोगों को रोज खेलाती
थीं | बचपन के ये छोटे-छोटे किस्से तफसील
से समय आने पर फिर कभी लिखूंगा | मेरी नोटबुक में शिवजी के प्रारम्भिक जीवन, आरा
में बीते उनके जीवन, और परिवार के अन्य लोगों से सम्बद्ध बहुत सी छोत्री-छोटी
सूचनाएं भरी पड़ी हैं, जो रोचक हैं, और उस समय की परिस्थितियों का चित्र उपस्थित
करती हैं |
हमलोगों के
पहले पुरखे सुथर दास जो अपने माता-पिता के साथ
शेरपुर (गाजीपुर) से आकर उनवांस अपने (ननिहाल) में बस गए थे, उनकी माँ के एक भाई (शायद
चचेरे) दीनालाल उनवांस में रहते थे |
(उनके पिता का नाम नहीं पता लगता |) दीनालाल
ने ही अपनी बहन (सुथर लाल की माँ) की शादी
शेरपुर में की थी, लेकिन फिर बहन-बहनोई को बुला कर बहन के मायका-गाँव उनवांस में ही
बसा लिया था | सुथर दास के पिता और नाना का नाम भी ज्ञात नहीं है | लेकिन ‘देहाती दुनिया’ में भोलानाथ के
पिता, नाना और नानी का ज़िक्र आता है | अपने पूर्वज सुथर दास के आप्रवास की यह कथा शिवजी
ने अपने बड़े-बुजुर्गों सुनी होगी जिसे उन्होंने ‘देहाती दुनिया’ में उपन्यास के रूप में लिखा | भोलानाथ ‘देदु’ में गाजीपुर
वाले अपने गाँव का भी ज़िक्र करते हैं जहाँ से वे अन्ततः माता-पिता के साथ ‘रामसहर’ आते हैं; लेकिन ‘देदु’ की मूल कथा इसी
(‘उनवांस’ गाँव) ‘रामसहर’ की है, जो ‘देदु’ के ‘भोलानाथ’ की ननिहाल है | मूसन
तिवारी के भतीजे की बरात में अपने पिता के
साथ वे अपने गाजीपुर वाले गाँव के पास के किसी गाँव में जाते हैं – लेकिन यह शिव के बचपन में गए किसी बरात पर आधारित
विवरण है | गोबर्धन के महादेई के साथ
भागने की खबर लेकर हजाम ‘भोलानाथ’ के पिता के गाजीपुर वाले गाँव में ही आता है,जहाँ
से वे फिर रामसहर की अपनी दीवानी के काम
पर – जो उन्हें अपने ससुर (नाना) से मिली थी, ‘राम सहर’ लौटते हैं |
पिता की
ससुराल : मेरी ननिहाल
बाबूजी के
तीसरे विवाह (मेरी माँ) और बरात की बातें भी बहुत रोचक हैं | इसके बारे में कुछ
साहित्यकारों ने अपने संस्मरणों में भी लिखा है, और बाबूजी की चिट्ठियों
(‘समग्र’-१०) में भी बहुत सारी जानकारी है | लेकिन पहले मुझको अपनी सगी मामी से
मिली जानकारी की बात करनी है | उन्होंने ही बताया कि माँ का कन्यादान मेरे बड़का मामा जगन्नाथ प्रसाद ने किया था
(क्योंकि मेरे नाना तब शायद नहीं थे) | बनारस से ५ पंडित बरात में गए थे | गाँव
वाले कहते थे इतने विधि-विधान से कोई विवाह होते अब तक नहीं देखा था | तिलक में १ रु. और १ धोती चढ़ी थी | बरात गाँव के बाहर स्कूल के पास मठिया पर ठहरी
थी | बनारस में बाबूजी के मित्र पं. विन्ध्येश्वरी प्रसाद मिश्र से (जो बनारस में
सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल में संस्कृत-पंडित थे ) बड़ी दीदी (मौसी) ने माँ के लिए लड़का
बताने को कहा था | मिश्रजी ने कहा, लड़का तो है पर दोआह-तेआह है (अर्थात
पहले उसकी दो पत्नियाँ मर चुकी हैं ) | फिर भी मौसी राज़ी हो गयीं और शास्त्रीजी और
बड़े मामा के साथ बनारस शिवजी को देखने भी गयीं| शिव से मिलीं | साफ़ बातें हुईं | शिवजी ने शर्तें कहीं – मशरख (विलासपुर गाँव से ८ किमी
दूर) रेलवे स्टेशन आकर वहां धर्मशाला में
मैं खुद देखूँगाऔर कुछ बातें भी करूंगा | वे मशरख गए – धर्मशाला में भावी पत्नी को
देखा, बातें भी कीं, दोआह-तेआह वाली बात
भी पूछी |यह भी पूछा - मैं आपको पसंद हूँ
? सीने-पिरोने, पढने-लिखने, खाना पकाने, सबके विषय में पूछा | कह कर गए – लड़की
मुझे बहुत पसंद है | फिर बड़े मामा बनारस गए और सब बातें करने | लेकिन उसी बीच एक नए किराये के मकान में छत से
गिरने के कारण उनका दायाँ पैर टूट गया | तब फिर कहला कर पूछा – मैं तो अब लंगड़ा हो
गया हूँ, क्या अब भी शादी करेंगी (मौसी को लिखे पत्र में इसकी चर्चा है )|
मामा-दीदी उस हालत में उनको फिर देखने गए | बड़े मामा ने पूछा कि तीमारदारी के लिए
दीदी रुक जाएँ? पर शिवजी ने आग्रहपूर्वक लौटा दिया | लेकिन दीदी कह कर गयीं – आप
लंगड़े रहेंगे तब भी शादी आप ही से होगी |
|
मामी ने बताया
(५/८/८९) कि नाना-नानी में खूब झगडा होता था | दरवाजे पर बैठ कर नानी कहतीं - हम
केतना करमजरू बानी | हमार करम फूट गईल | फिर नाना कहते – बाकि हम त केतना भाग्यवान बानी – एतना
सुन्दर मेहरारू, सुन्दर भरल-पुरल बाल-बच्चा के परिवार – अब का चाहीं | इसी समय
कहीं से एक संत आ गए थे | वे बोले – जजमान, जब तक आप इनकी पीठ नहीं ठोकेंगे, ये
नहीं मरेंगी | फिर नानी जबतक घर में चावल आदि लेने गयीं, वह साधु गायब हो गया |
नानी अंततः अतिसार से मरी थीं | उनके प्राण अंटके हुए थे | पर नाना पीठ नहीं
ठोंकना चाहते थे, कहते रहे – “ ई मर जैहें
त हमार का होई|” पर जब लोगों ने बहुत समझाया तब पीठ ठोंकी और तभी नानी के प्राण छूटे | उसके ७ साल बाद, बहुत बूढ़े होकर नाना मरे | केवल एक उलटी और
दस्त के बाद हार्ट फेल हो गया | ( बचन कुमारी – मेरी माता - के विवाह में दोनों
नहीं थे | सब कुछ बड़े मामा और बड़ी मौसी ने ही किया |)
मेरी माँ फूलन
मामा को बेहद प्यार करती थीं |उनके बारे में बराबर कहतीं – ई इतना सौखीन बा कि अपना मेहरारू के आँचर फार
के रूमाल बनाई | मामा बनारस में इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे | माँ-बाबूजी तब तक लहेरिया सराय चले
गए थे | बड़का मामा ५ रु. नहीं भेज पाए इसलिए इम्तहान नहीं दे सके | मामी ने एक बार
बाबूजी से दिल्लगी में कहा था (उनवांस परिवार के प्रति परिहास में उसकी हीनता
दिखाते हुए) – रऊआ नियर महान आदमी - इहाँ उनवांस में कैसे पैदा हो गईल ? बाबूजी हंस
कर बोले – काबुल में गदहा ना होला ? हम ऊहे नू हईं !
मामी ने बताया
कि मेरी माँ – बचन देवी- कुल सात बहनें थीं, और आठ भाई जिनमें छ: बचपन में ही मर
गए थे | शेष में सबसे बड़े थे जगन्नाथ प्रसाद (जो बाद में हथुआ राज स्कूल में शायद
हेड मास्टर हुए ) और सबसे छोटे थे फूलन
(यदुनाथ) प्रसाद | सबसे बड़ी दो बहनें थीं | सबसे बड़ी की शादी खैरा में हुई थी (
छपरा के बाद का स्टेशन), फिर ‘बड़ी दीदी’ (मौसी) जिसकी शादी बनसोहीं (विलासपुर के
बगल में वसंतपुर के पास) हुई थी, और जो बालविधवा रहीं – शादी के ९ महीने बाद ही
हर्निया से पति की मृत्यु हो गयी थी | इस अकाल मृत्यु का हाल सुनते ही उनकी बड़ी
बहन का हार्ट फेल कर गया था | बनसोहीं परिवार में ही चचेरे भसुर के रिश्ते में थे
महामाया बाबू | तीसरी बहन पार्वती (निस्संतान रहीं ) – पति किशोरी प्रसाद (
निवासी,भगवानपुर गाँव,विलास पुर से डेढ़ मील पर) जिनकी चंपारण में बहुत ज़मीन थी,
उनकी फिर दूसरी शादी से मणि भैया, फनी आदि हुए, जो परिवार छपरा( दहियावां) में है
( मेरी ली हुई जिसकी तस्वीरें मेरे पास हैं )| अब यह परिवार रामनगर में रहता है | (मौसा
मृत्यु ल.१९८४) | चौथी बहन – प्रानपति
(विवाह श्रीकृष्णप्रसाद, सोहागपुर, हथुआ
के पास) | पांचवीं मेरी माँ –बचन कुमारी | छठी शायद बचपन में ही अविवाहित मरीं | सातवीं
सुदामा (बिंदालाल के रामपुर, सीवान में ब्याहीं) | मौसा के बड़े लड़के शिवकुमार भैया
(पहली पत्नी से), जो छपरा में हमारे घर पर रह कर पढ़ते थे | और जिनकी शादी जयप्रकाशजी की भतीजी से हुई थी | उस
शादी की बरात में बाबूजी के साथ मैं भी
जेपी के उस गाँव में गया था | दूसरी
पत्नी, सुदामा मौसी से एक पुत्र विश्वनाथ,
और पुत्री सरस्वती हुए (जिसने छपरा में बचपन में मेरे पैर पर खंती गिराई थी )|
मौसा और मेरे ननिहाल के लोग ज़्यादातर छपरा में हमारे साथ ही ही रहते थे | हमारी बक्सर वाली बुआ के लड़के
बच्चन भैया (रवीन्द्र वर्मा) और छोटे चाचा के छोटे दामाद हरीन्द्रजी भी छपरा में
हमारे यहाँ रह कर ही पढ़ते थे |
मामी ने बताया
कि नानी बिलकुल माँ जैसी गोरी, सुन्दर, सरल, सीधे स्वभाव की, दयालु थीं | बदन पर
पहना वस्त्र भी उतार कर गरीब को दे देती थीं | नाना (रामावतार प्रसाद) चिढ़ते थे –
स्वभाव के खर्रे,लंगड़े, कुरूप थे, पर जवार में उनका पूरा रोब-दाब था | उनको घोड़े
पर चढ़ा कर लोग पंचायत के लिए ले जाते थे | लेकिन बाज़ लोग इसलिए नहीं भी ले जाना
चाहते थे क्योंकि वे खरी-सच्ची बात ही
बोलते थे, और बिलकुल सही सच्चा न्याय करते थे | मेरे नाना नानी को बहुत प्यार करते थे | दोनों के बीच चख-चुख भी होती रहती थी | नानी २
किलो सुबह, २ किलो शाम दूध पीती थीं | नाना ने उनके लिए अलग गाय-भैंस रखी थी|
नाना-नानी सदा विलासपुर में ही रहे, लेकिन शेष परिवार ज़्यादातर हथुआ में ही रहता
था | नाना वहां राज कर्मचारी थे | अमला लाइन में क्वार्टर था | वहीँ ब्रिज नारायण
प्रसाद (परनाना) हथुआ राज में अकाउंटेंट थे | मामी की शादी वहीँ पर हुई थी | वे
महमूदपुर गाँव की रहने वाली थीं | परनाना की जगह पर फिर नाज़िर मामा की बहाली हो
गयी थी | नाना के छोटे भाई श्यामा प्रसाद – जिनको पहली पत्नी से नाज़िर मामा (रघुनाथ
प्रसाद), और उनके मरने पर दूसरी पत्नी से धर्मनाथ प्रसाद हुए थे | (इन दोनों के परिवार के लोगों के बारे में
सबकी जानकारी रही, मेरा संपर्क भी रहा, पर अब उनमें से प्रायः सभी दिवंगत हो चुके
हैं )| मेरी परनानी भी हथुआ क्वार्टर में
रही थीं | नाना जब मरे, फूलन मामा ७ साल के थे, और जब नानी मरीं तब वे ९ महीने के
ही थे | फूलन मामा को बहनों ने ही पाला था | माँ तो उनको अपने बेटे की तरह मानती
थीं | मेरी नानी बहुत दयावान थीं; इतनी दानशीला थीं कि से कोई बस कह देता – सरकार,
अपने के साडी बहुत नीमन बा, तो तुरत बदल कर उसको दे देतीं – जा तोहरा पसंद बा त ले
जा |
[ इस पारिवारिक और मेरे बचपन के इतिवृत्त की आगे की श्रृंखलाएं इसी ब्लॉग पर आगे प्रकाशित होंगी| इसके बाद यहाँ पुराने पारिवारिक चित्रों का एक अल्बम भी प्रकाशित होगा, जिसमें कुछ ऐसे परिजन के दुर्लभ चित्र होंगे जिन सब को मैंने अपनी फोटोग्राफी के शौक के तहत लगभग १९५० के आस-पास से खींचना शुरू किया था, और जिन सबके नेगेटिव मेरे संग्रह में अब भी सुरक्षित हैं | अपने फोटोग्राफी के शौक की कहानी भी उन चित्रों के साथ ही मैं प्रस्तुत करूंगा | यह एक ऐसी चीज़ होगी जो शायद ही कहीं किसी ने इस तरह प्रकाशित की होगी |]
पहले दो चित्र हमारे उस पुराने मकान के हैं, जो मेरे बचपन में था और इधर हाल में (२०१८) उसके भग्नावशेष को ढहा दिया गया है जहाँ अब आ. शिवपूजन सहाय का उनके जन्म-गृह के स्थान पर एक स्मारक बनाने की योजना है| निचले दोनों चित्र गाँव से सटे उत्तर स्थित पोखरे के हैं जहाँ शिवजी गाँव आते-जाते रुक कर मंदिर में अवश्य नमन करते | यह शिव मंदिर आज भी है, और हाल में इस पोखरे के चारो ओर सुन्दर पार्क आदि बन गए हैं जिसके चित्र भी आप shivpoojan.blogspot.com पर देख सकते हैं |]
सभी सामग्री एवं चित्र कापी राईट : आ. शिवपूजन सहाय स्मारक न्यास




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